*मैं अब नहीं लड़ता… क्योंकि अब मैं साक्षी भाव में जीता हूँ*
प्रणव बजाज
लड़ना हमेशा साहस नहीं होता। कई बार यह केवल अहंकार की आदत होती है, जो हमें यह भ्रम देती है कि हम अस्तित्व को जीत सकते हैं। लेकिन जीवन को जीतने की नहीं, उसे देखने की जरूरत है—जैसा वह है, वैसा ही।
हमने जीवन को एक युद्धक्षेत्र बना दिया है। हर विचार को सही साबित करना है, हर असहमति को पराजय में बदलना है, और हर संबंध में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करनी है। लेकिन इस दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि जिस क्षण हम जीतते हैं, उसी क्षण भीतर कुछ हार जाता है—शांति, मौन और स्वयं का बोध।
आज संघर्ष केवल बाहर नहीं है, वह भीतर भी है। घरों में, रिश्तों में, कार्यस्थलों में और अब हमारे मन की स्क्रीन पर भी। एक विचार हमें उत्तेजित कर देता है, एक शब्द हमें आहत कर देता है, और हम प्रतिक्रिया को ही जीवन समझ लेते हैं।
लेकिन क्या कभी हमने देखा है—कि प्रतिक्रिया के इस निरंतर प्रवाह में हम स्वयं को खो रहे हैं?
ओशो कहते हैं—“साक्षी बनो।”
यही साक्षी भाव मुझे अब समझ में आने लगा है। जब मैं हर बात का उत्तर देना छोड़ देता हूँ, तब मौन कोई कमजोरी नहीं रहता, वह जागरूकता बन जाता है।
मेरा मन यह संकेत देता है कि मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना से जुड़े हुए हैं। हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ मन लगातार उत्तेजित है, और शांति एक दुर्लभ अनुभव बन गई है।
तो प्रश्न यह नहीं है कि हम किससे लड़ रहे हैं। प्रश्न यह है कि क्या हम जानते भी हैं कि हम क्यों लड़ रहे हैं?
मैंने लड़ना इसलिए नहीं छोड़ा कि मैं कमजोर हो गया हूँ। मैंने इसलिए छोड़ा क्योंकि अब मैं देख सकता हूँ कि अधिकांश लड़ाइयाँ अनावश्यक हैं—वे अहंकार द्वारा रची गई हैं, सत्य द्वारा नहीं।
नदी किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करती, फिर भी सागर तक पहुँच जाती है। हवा किसी से संघर्ष नहीं करती, फिर भी पूरे आकाश को छू लेती है। अस्तित्व का स्वभाव संघर्ष नहीं, प्रवाह है।
अब मेरे लिए मौन पलायन नहीं, ध्यान है।
प्रतिक्रिया देना अनिवार्यता नहीं, चुनाव है।
और हर असहमति युद्ध नहीं, केवल एक दृष्टिकोण है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय के सामने आँखें बंद कर ली जाएँ। अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना आवश्यक है, पर वह खड़ा होना भी जागरूकता से हो—अहंकार से नहीं। क्योंकि अहंकार से लड़ी गई हर लड़ाई अंततः और अहंकार ही पैदा करती है।
असली प्रश्न यह है—क्या हम अपने भीतर के मौन को बचा पा रहे हैं?
क्योंकि अंत में कोई यह नहीं पूछेगा कि हमने कितनों को हराया। जीवन यह पूछेगा कि इस पूरे संघर्ष में हमने स्वयं को कितना जाना, और कितना खो दिया।
*मैं अब नहीं लड़ता… क्योंकि अब मैं साक्षी हूँ। और साक्षी कभी हारता नहीं, वह केवल देखता है।*

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