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मनरेगा पर कैग की बड़ी रिपोर्ट

 


 

मध्य प्रदेश में रोजगार गारंटी का दावा सवालों के घेरे में, 1 करोड़ पंजीकृत मजदूरों में केवल 2% को मिले 100 दिन का काम


प्रणव बजाज

भोपाल। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की वर्ष 2019-20 से 2023-24 की अवधि पर आधारित ताज़ा निष्पादन लेखापरीक्षा रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में पंजीकृत परिवारों में से केवल लगभग 2 प्रतिशत को ही कानून के अनुसार 100 दिन का रोजगार मिल सका। 


प्रमुख निष्कर्ष

केवल 2% परिवारों को 100 दिन का रोजगार मिला।

31.21% से 46.60% परिवारों को 40 दिन से भी कम रोजगार मिला।

31 मार्च 2024 तक मजदूरी और सामग्री मद में लगभग 1217 करोड़ रुपये का भुगतान लंबित था, जिसमें करीब 55 करोड़ रुपये मजदूरी के थे

2,426 डुप्लीकेट/फर्जी जॉब कार्डों के माध्यम से लगभग 1.46 करोड़ रुपये का अनियमित भुगतान पाया गया।


कई स्थानों पर मजदूरों को प्रचलित मजदूरी दर से 20 से 25 प्रतिशत कम भुगतान किया गया। 


आठ जिलों में मिली अनियमितताएं


रिपोर्ट में बैतूल, बुरहानपुर, छिंदवाड़ा, मंडला, रायसेन, सागर, उमरिया और विदिशा जिलों में फर्जी अथवा डुप्लीकेट जॉब कार्ड, भुगतान संबंधी गड़बड़ियां और रिकॉर्ड में त्रुटियां दर्ज की गई हैं। 


जमीनी जांच में चौंकाने वाले तथ्य


कैग की टीम ने कई कार्यस्थलों का निरीक्षण किया। रिपोर्ट में ऐसे उदाहरण दर्ज हैं जहां:


कागजों में तालाब निर्माण दर्शाया गया, जबकि मौके पर खेत मिला।


कहीं तालाब पर लाखों रुपये खर्च दिखाया गया, लेकिन स्थल पर तालाब सूखा या अधूरा पाया गया। 


कैग की प्रमुख सिफारिशें


कैग ने राज्य सरकार को सुझाव दिया है कि:


वास्तविक जरूरतमंद परिवारों की पहचान मजबूत की जाए।


रिक्त पद शीघ्र भरे जाएं।


ग्राम पंचायत स्तर पर बेहतर योजना और सामाजिक लेखापरीक्षा सुनिश्चित की जाए।


शिकायत निवारण तंत्र तथा निगरानी व्यवस्था को प्रभावी बनाया जाए। 

बड़ा सवाल

मनरेगा का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को गारंटीकृत रोजगार उपलब्ध कराना है। यदि अधिकांश परिवारों को 100 दिन तो दूर, 40 दिन का भी रोजगार नहीं मिल पा रहा है और भुगतान व फर्जीवाड़े जैसी अनियमितताएं सामने आ रही हैं, तो योजना के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कैग की रिपोर्ट प्रशासनिक जवाबदेही और सुधारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता की ओर स्पष्ट संकेत करती है।

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