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4.15 करोड़ की लग्जरी घड़ी के साथ गिरफ्तारी: इंदौर के उद्योगपति मयंक बागानी पर कस्टम की कार्रवाई, हाईकोर्ट तक पहुंचा मामला

 


सिंगापुर से लौटते समय दिल्ली एयरपोर्ट पर हुई कार्रवाई, जमानत मिलने के बाद कस्टम विभाग ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया

बौद्धिक प्रतिकार | प्रणव बजाज

इंदौर की प्रसिद्ध शिवानी डिटर्जेंट्स प्राइवेट लिमिटेड के निदेशक मयंक बागानी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर कस्टम विभाग ने उन्हें लगभग 4.15 करोड़ रुपये मूल्य की रिचर्ड मिल आरएम 35-03 राफेल नडाल लक्जरी घड़ी के साथ पकड़ा। आरोप है कि यह घड़ी सिंगापुर से भारत लाई जा रही थी और इसकी अनिवार्य घोषणा नहीं की गई।


मामले में गिरफ्तारी के बाद निचली अदालत से मयंक बागानी को जमानत मिल गई, लेकिन कस्टम विभाग ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है। मामला फिलहाल न्यायालय में विचाराधीन है।

कौन हैं मयंक बागानी?

मयंक बागानी इंदौर के प्रतिष्ठित बागानी परिवार से हैं। उपलब्ध कंपनी अभिलेखों के अनुसार उनके पिता कृष्णचंद बागानी हैं। परिवार के अन्य प्रमुख सदस्य एवं व्यवसाय से जुड़े नाम इस प्रकार हैं—

नरेश बागानी


कुवैत बागानी


रोनक बागानी


चंद्रलोक बागानी


सूरज बागानी


परिवार का नाम डिटर्जेंट और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़ा रहा है। हालांकि, वर्तमान कस्टम मामले में आरोप केवल मयंक बागानी से संबंधित हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अन्य परिवार के किसी सदस्य पर इस मामले में कोई आरोप नहीं है।

कस्टम विभाग किन पहलुओं की कर रहा है जांच?


कस्टम विभाग यह पता लगाने में जुटा है कि—


घड़ी की खरीद का भुगतान किस माध्यम से किया गया।


क्या विदेश यात्राओं के दौरान पहले भी ऐसी महंगी वस्तुएं लाई गई थीं।


क्या आयात नियमों और सीमा शुल्क का पालन किया गया।


क्या यह केवल डिक्लेरेशन का मामला है या तस्करी के प्रयास का।


जमानत क्यों मिली?

निचली अदालत ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया में कानूनी औपचारिकताओं के पालन को लेकर सवाल उठने के बाद मयंक बागानी को जमानत दे दी। कस्टम विभाग का कहना है कि जांच अभी अधूरी है, इसलिए उसने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर जमानत आदेश को चुनौती दी है।

4.15 करोड़ की घड़ी क्यों बनी चर्चा का विषय?

बरामद घड़ी रिचर्ड मिल आरएम 35-03 राफेल नडाल मॉडल बताई गई है। यह दुनिया की सबसे महंगी स्पोर्ट्स लक्जरी घड़ियों में गिनी जाती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी कीमत लगभग 4.5 से 5.5 करोड़ रुपये तक हो सकती है।

बौद्धिक प्रतिकार का विश्लेषण

यह मामला केवल एक महंगी घड़ी का नहीं है, बल्कि विदेश से लाई जाने वाली उच्च मूल्य की वस्तुओं की घोषणा, सीमा शुल्क नियमों के पालन और जांच एजेंसियों की कार्रवाई की पारदर्शिता से भी जुड़ा है। दूसरी ओर, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जब तक अदालत अंतिम निर्णय न दे, तब तक किसी भी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं किया जा सकता।

(नोट: यह मामला न्यायालय में विचाराधीन है। समाचार उपलब्ध न्यायालयी दस्तावेजों और सार्वजनिक जानकारी पर आधारित है।)

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