संपादकीय
प्रणव बजाज
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर युवाओं के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई दे रही है। हाल के छात्र और युवा आंदोलनों ने यह संकेत दिया है कि रोजगार, शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं की पारदर्शिता और अवसरों जैसे मुद्दे अब चुनावी विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव इस जनभावना को राजनीतिक समर्थन में बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आज सड़कों पर दिख रहा युवाओं का उत्साह विधानसभा चुनाव तक उसी ऊर्जा के साथ कायम रह पाएगा? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि आंदोलनों की गर्मी अक्सर समय के साथ ठंडी पड़ जाती है। यदि आंदोलन को स्पष्ट नेतृत्व, ठोस एजेंडा और निरंतर जनसंपर्क नहीं मिलता, तो उसका प्रभाव भी सीमित हो जाता है।
राहुल गांधी और अखिलेश यादव के सामने चुनौती केवल सरकार की आलोचना करना नहीं, बल्कि युवाओं के सामने रोजगार, शिक्षा सुधार, परीक्षा प्रणाली और आर्थिक अवसरों को लेकर भरोसेमंद विकल्प प्रस्तुत करना भी है। दूसरी ओर, भाजपा भी अपने संगठन और सरकारी योजनाओं के जरिए युवाओं तक पहुंच बनाने में जुटी है। ऐसे में मुकाबला केवल नारों का नहीं, बल्कि विश्वास का होगा।
उत्तर प्रदेश का युवा मतदाता पहले की तुलना में अधिक जागरूक और मुखर दिखाई देता है। वह जातीय और पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों के साथ-साथ रोजगार, शिक्षा, डिजिटल अवसर और सुशासन जैसे मुद्दों पर भी निर्णय ले रहा है। यही कारण है कि सभी प्रमुख दल युवाओं को अपने पक्ष में करने की रणनीति बना रहे हैं।
आखिरकार, लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत मतदाता का विश्वास होता है। यदि युवाओं की अपेक्षाओं को केवल चुनावी भाषणों तक सीमित रखा गया, तो उनका उत्साह निराशा में भी बदल सकता है। इसलिए सभी राजनीतिक दलों के लिए यह समय केवल राजनीति करने का नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य को लेकर ठोस और विश्वसनीय रोडमैप प्रस्तुत करने का है।
उत्तर प्रदेश का आगामी चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि राज्य की राजनीति में युवा मतदाता कितना निर्णायक बन चुका है। जो दल युवाओं के विश्वास को लंबे समय तक बनाए रख पाएगा, वही चुनावी मैदान में वास्तविक बढ़त हासिल कर सकेगा।

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