10 साल से अदालत का आदेश ठंडे बस्ते में: आखिर कौन ज़िम्मेदार
प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश में शासन के आदेशों के पालन को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। प्रदेश हाईकोर्ट के 108 तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के वेतन और एरियर से जुड़ा मामला 2016 से लंबित है। 2017 में कर्मचारियों के पक्ष में स्पष्ट न्यायिक आदेश आने के बावजूद नौ-दस वर्षों में उसका पूर्ण अनुपालन नहीं हो सका। इस बीच कई मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव बदल गए, लेकिन कर्मचारियों को न्याय नहीं मिला।
क्या है पूरा मामला?
वर्ष 2016 में 108 कर्मचारियों ने वेतन वृद्धि और अतिरिक्त वेतनवृद्धि की मांग को लेकर याचिका दायर की।
28 अप्रैल 2017 को हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में आदेश देते हुए वेतनवृद्धि और एरियर देने के निर्देश दिए।
आदेश लागू नहीं होने पर 2018 में अवमानना याचिका दायर हुई।
अदालत ने कई बार राज्य सरकार से जवाब मांगा और सख्त टिप्पणियां कीं, लेकिन मामला लगातार टलता रहा।
मुख्य सचिव बदलते रहे, फाइल नहीं चली
इस मामले के दौरान इकबाल सिंह बैस, वीरा राणा, अनुराग जैन और अब अशोक वर्णवाल तक प्रशासनिक नेतृत्व बदल चुका है। अदालत ने कई मौकों पर मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति तक के निर्देश दिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल पद बदलने से अवमानना की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
सरकार की दलील पर अदालत की नाराजगी
मार्च 2026 की सुनवाई में हाईकोर्ट ने कहा कि 2017 के आदेश का अब तक पूर्ण पालन नहीं हुआ। अदालत ने यह भी माना कि सरकार द्वारा प्रस्तुत अनुपालन रिपोर्ट संतोषजनक नहीं है और पहले दी जा चुकी दलीलों को दोहराया गया है। इसके बाद राज्य सरकार ने रिट अपील दायर की, जिससे मामला और लंबा खिंच गया।
बड़ा सवाल
यह मामला केवल 108 कर्मचारियों का नहीं है। यह इस बात की भी परीक्षा है कि यदि स्वयं हाईकोर्ट के आदेशों का समय पर पालन नहीं हो, तो सामान्य नागरिक को न्याय मिलने की उम्मीद कितनी मजबूत रह जाती है।
विश्लेषण
न्यायिक आदेश के अनुपालन में लगभग एक दशक की देरी प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न है।
लगातार बदलते प्रशासनिक नेतृत्व के बावजूद फाइल का आगे न बढ़ना शासन व्यवस्था की कार्यकुशलता पर बहस खड़ी करता है।
यदि अंतिम निर्णय कर्मचारियों के पक्ष में बरकरार रहता है, तो सरकार पर एरियर और वित्तीय दायित्व का बोझ और बढ़ सकता है।
बौद्धिक प्रतिकार का सवाल
**जब अदालत के आदेश का पालन कराने के लिए भी अदालत को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़े, तो जवाबदेही आखिर तय किसकी होगी?**

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