— पप्पू अकेला नहीं, पूरी विपक्षी टोली मैदान में
प्रणव बजाज
कल प्रधानमंत्री आवास के बाहर जो राजनीतिक दृश्य देखने को मिला, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या विपक्ष का सबसे बड़ा एजेंडा अब सिर्फ धरना, प्रदर्शन और फोटो सत्र तक सिमट गया है?
राहुल गांधी आगे थे, लेकिन पीछे पूरा विपक्ष कतार में दिखा। प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और कई छोटे-बड़े दलों के नेता भी ऐसे जुटे मानो देश की सबसे बड़ी चुनौती का समाधान धरने की तस्वीरों में छिपा हो। कोई नारे लगा रहा था, कोई कैमरे की ओर मुखातिब था और कोई अगले वायरल चित्र की तैयारी में दिखाई दिया।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने सरकारी कामकाज और बैठकों में व्यस्त रहे। इधर विपक्ष का पूरा कुनबा एक मंच पर शक्ति प्रदर्शन करता रहा। ऐसा लगा जैसे सरकार से राजनीतिक मुकाबले के लिए अब संसद, नीति और बहस से ज्यादा भरोसा धरना-राजनीति पर हो गया है।
राजनीति में विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब हर मुद्दे का अंत कैमरे, नारे और प्रदर्शन पर ही हो जाए, तब जनता पूछती है—रोजगार, महंगाई, विकास, शिक्षा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर ठोस वैकल्पिक नीति कब सामने आएगी?
आज विपक्ष का शायद ही कोई बड़ा या छोटा नेता बचा हो जिसने किसी न किसी धरने में अपनी मौजूदगी दर्ज न कराई हो। ऐसा प्रतीत होता है कि विपक्ष की राजनीति अब "एक मंच, अनेक चेहरे" के फार्मूले पर चल रही है, जहां मुद्दे से ज्यादा महत्व तस्वीर में दिखने का रह गया है।
जनता अंततः नारों की आवाज़ से नहीं, काम के परिणाम से फैसला करती है। लोकतंत्र में ट्रॉफी धरने की नहीं, जनादेश की होती है। कैमरे की फ्लैश कुछ पल चमकती है, लेकिन जनता की याददाश्त अगले चुनाव तक साथ चलती है।
(यह लेख राजनीतिक व्यंग्य है। इसका उद्देश्य सार्वजनिक राजनीतिक घटनाओं पर हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत करना है।)

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