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मोहन का गढ़ या गुंडों का गढ़?

 


महाकाल की नगरी में कानून बेबस, अपराधी बेखौफ!

विशेष व्यंग्य | प्रणव बजाज

महाकाल की नगरी उज्जैन कभी आस्था, संस्कृति और शांति की पहचान थी। आज वही शहर हत्या, चाकूबाजी, लूट और गुंडागर्दी की खबरों से सुर्खियों में है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस शहर से प्रदेश के मुख्यमंत्री आते हों, यदि वहीं कानून-व्यवस्था पर लगातार सवाल उठ रहे हों, तो आम नागरिक प्रदेश के बाकी हिस्सों में खुद को कितना सुरक्षित महसूस करेगा?


ताज़ा घटना में उज्जैन के एक भोजनालय में दो सगे भाइयों की हत्या ने पूरे शहर को झकझोर दिया। यह घटना लोगों के मन में भय और व्यवस्था पर अविश्वास को और गहरा करती है।

उज्जैन ही नहीं, नागदा, खाचरोद, बड़नगर और आसपास के क्षेत्रों में भी लगातार अपराध की घटनाओं को लेकर स्थानीय स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है। आम नागरिक पूछ रहा है कि आखिर अपराधियों में कानून का भय क्यों समाप्त होता दिखाई दे रहा है? क्या पुलिस का खौफ कम हुआ है, या अपराधियों का मनोबल बढ़ा है?

सत्ता चाहे किसी की भी हो, कानून का राज सबसे ऊपर होना चाहिए। यदि अपराधी खुलेआम वारदात करें और जनता को न्याय मिलने में संदेह होने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय है।

व्यंग्य यही कहता है कि अब लोग पूछने लगे हैं—

"यह मोहन का गढ़ है या गुंडों का गढ़?"

यदि सरकार के दावे और ज़मीनी हकीकत में इतना बड़ा अंतर दिखाई देगा, तो सवाल उठेंगे ही। जनता को भाषण नहीं, सुरक्षित सड़कें चाहिए। घोषणाएँ नहीं, अपराधियों पर निर्णायक कार्रवाई चाहिए। महाकाल की नगरी की पहचान अपराध नहीं, कानून का सम्मान और शांति होनी चाहिए।

व्यंग्य का उद्देश्य किसी व्यक्ति या समुदाय पर आरोप लगाना नहीं, बल्कि व्यवस्था को आईना दिखाना है। जनता की अपेक्षा केवल इतनी है कि अपराधी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई हो।

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