प्रणव बजाज
भोपाल/इंदौर। मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड में मनोज मालपानी की नियुक्ति को लेकर उठ रहे प्रश्नों के बीच अब तीसरा बड़ा सवाल नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सामने आ रहा है। किसी भी वैधानिक बोर्ड में नियुक्ति केवल व्यक्ति विशेष का विषय नहीं होती, बल्कि यह सार्वजनिक विश्वास और प्रशासनिक निष्पक्षता से भी जुड़ा प्रश्न होता है।
सामान्य प्रशासनिक सिद्धांतों के अनुसार ऐसी नियुक्तियों में यह अपेक्षा की जाती है कि चयन का आधार स्पष्ट, अभिलेखीय और वस्तुनिष्ठ हो। यदि किसी व्यक्ति का चयन किया जाता है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किन मानकों के आधार पर उसे उपयुक्त माना गया और क्या अन्य संभावित नामों पर भी विचार किया गया।
अब तक सरकार की ओर से यह सार्वजनिक नहीं किया गया है कि मनोज मालपानी के चयन के लिए कौन-कौन से मापदंड अपनाए गए और पूरी प्रक्रिया किस प्रकार संपन्न हुई।
*सरकार से उठते हैं ये महत्वपूर्ण प्रश्न*
क्या नियुक्ति के लिए कोई निर्धारित चयन मानदंड था?
क्या इस पद के लिए एक से अधिक नामों पर विचार किया गया था?
क्या चयन से संबंधित कोई अभिलेखीय अनुशंसा या समिति की कार्यवाही उपलब्ध है?
क्या सरकार नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक करेगी?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पारदर्शिता केवल निर्णय लेने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह भी आवश्यक है कि निर्णय का आधार जनता के सामने स्पष्ट हो। यदि सरकार चयन प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज और मानदंड सार्वजनिक करती है, तो नियुक्ति को लेकर उठ रहे अनेक प्रश्नों का स्वतः समाधान हो सकता है।
नोट: यह रिपोर्ट सार्वजनिक अभिलेखों, उपलब्ध दस्तावेजों तथा सामान्य प्रशासनिक सिद्धांतों के आधार पर तैयार की गई है। इसमें किसी व्यक्ति पर किसी प्रकार के अवैध या अनियमित आचरण का आरोप नहीं लगाया गया है। यदि मनोज मालपानी, मध्य प्रदेश सरकार अथवा संबंधित विभाग अपना पक्ष देना चाहें, तो बौद्धिक प्रतिकार उसे समान प्रमुखता से प्रकाशित करेगा।
*अगली कड़ी: "क्या वक्फ बोर्ड की नियुक्ति में निर्धारित पात्रता और अनुभव के सभी मानकों का पूर्ण पालन किया गया?"*

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