नई दिल्ली | बौद्धिक प्रतिकार
देश में तेजी से फैलती कोचिंग संस्कृति अब केंद्र सरकार की चिंता का बड़ा कारण बन गई है। करीब 7 करोड़ छात्रों और 58 हजार करोड़ रुपये से अधिक के कारोबार वाली कोचिंग इंडस्ट्री को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर कानूनी दायरे में लाने की तैयारी शुरू हो गई है। सरकार एक ऐसे राष्ट्रीय कानून पर विचार कर रही है, जिसका उद्देश्य केवल संस्थानों को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि छात्रों पर बढ़ते मानसिक दबाव, आर्थिक बोझ और आत्महत्या जैसी घटनाओं पर भी रोक लगाना है।
पिछले कुछ वर्षों में देश के कई कोचिंग हब—खासकर कोटा जैसे शहरों—में छात्रों की आत्महत्या के बढ़ते मामलों ने व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। महंगी फीस, रिजल्ट का दबाव, भ्रामक विज्ञापन और सफलता की अंधी दौड़ ने शिक्षा को एक बड़े कारोबार में बदल दिया है।
सूत्रों के मुताबिक प्रस्तावित कानून में कोचिंग संस्थानों के रजिस्ट्रेशन, फीस संरचना, विज्ञापनों, छात्र सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जवाबदेही को लेकर सख्त प्रावधान किए जा सकते हैं। साथ ही सरकार स्कूल शिक्षा को मजबूत बनाकर छात्रों की कोचिंग पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी कदम उठा सकती है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रभावी नियमन लागू होता है, तो इससे करोड़ों छात्रों और उनके अभिभावकों को राहत मिल सकती है। हालांकि कोचिंग उद्योग का तर्क है कि जब तक प्रतियोगी परीक्षाओं का स्वरूप नहीं बदलता, तब तक कोचिंग की आवश्यकता बनी रहेगी।
बौद्धिक प्रतिकार विश्लेषण
सवाल सिर्फ कोचिंग का नहीं, पूरी शिक्षा व्यवस्था का है। जब स्कूलों की पढ़ाई प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए पर्याप्त नहीं मानी जाती, तब कोचिंग उद्योग फलता-फूलता है। ऐसे में केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं होगा। सरकार को परीक्षा प्रणाली, स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता और छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य—तीनों मोर्चों पर समान रूप से काम करना होगा। तभी शिक्षा "व्यवसाय" से आगे बढ़कर वास्तव में "भविष्य निर्माण" का माध्यम बन सकेगी।

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