प्रणव बजाज
मध्य प्रदेश की राजनीति भी बड़ी अजीब चीज है। जब शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री थे, तब विपक्ष कहता था कि बदलाव चाहिए। अब ढाई साल बाद कुछ लोग पूछ रहे हैं—"बदलाव तो हो गया, लेकिन फायदा किसे हुआ?"
मोहन सरकार के ढाई साल पूरे हो गए। सरकार उपलब्धियों की किताब लेकर घूम रही है और विपक्ष घोटालों की फाइल लेकर। जनता बीच में खड़ी सोच रही है कि आखिर सच कौन बोल रहा है।
कभी परिवहन विभाग चर्चा में आता है, कभी शिक्षा विभाग। कहीं करोड़ों के हिसाब गायब मिलते हैं, कहीं बिना हस्ताक्षर के बिल पास होने की खबरें सामने आती हैं। हर बार वही पुराना संवाद—"जांच के आदेश दे दिए गए हैं।"
ऐसा लगता है कि प्रदेश में दो चीजें सबसे तेजी से बढ़ रही हैं—एक घोटालों की खबरें और दूसरी जांच समितियां।
जनता पूछती है—"साहब, दोषी कौन है?"
जवाब आता है—"जांच चल रही है।"
जनता फिर पूछती है—"पैसा कहां गया?"
जवाब आता है—"जांच में पता चलेगा।"
जनता तीसरी बार पूछती है—"जांच कब पूरी होगी?"
जवाब आता है—"इसकी भी जांच की जाएगी।"
ढाई साल में सरकार ने निवेश सम्मेलन किए, घोषणाएं कीं, नए सपने दिखाए। लेकिन दूसरी तरफ बेरोजगार नौकरी का इंतजार करते रहे, किसान फसल का भाव पूछते रहे और आम आदमी महंगाई का हिसाब लगाता रहा।
विपक्ष का दावा है कि प्रदेश में घोटालों की नई फसल उग रही है। सरकार कहती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है। जनता कहती है—"जीरो टॉलरेंस है तो फिर इतने मामले सामने कैसे आ रहे हैं?"
सबसे दिलचस्प बात यह है कि हर घोटाले के बाद अधिकारी कहते हैं कि कार्रवाई होगी, और हर कार्रवाई के बाद जनता पूछती है कि आखिर हुआ क्या?
राजनीति के जानकार कहते हैं कि सरकार की सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, बल्कि वे खबरें हैं जो हर कुछ दिनों में किसी नए विभाग से निकलकर सामने आ जाती हैं।
ढाई साल बाद प्रदेश की जनता का हाल कुछ ऐसा है जैसे रेलवे स्टेशन पर खड़ा यात्री—घोषणाएं लगातार सुन रहा है, लेकिन जिस ट्रेन का इंतजार है, वह अभी तक प्लेटफॉर्म पर नहीं पहुंची।
और इसी बीच विपक्ष मुस्कुराते हुए कह रहा है—"मामा गए, लेकिन घोटाले नहीं गए।"

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