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जन्म से जुड़ी यह खून की बीमारी बच्चों की जिंदगी कर सकती है मुश्किल, जानिए थैलेसीमिया के बारे में सबकुछThis congenital blood disorder can make life difficult for children; learn all about thalassemia.

जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर है थैलेसीमिया, समय पर जांच और जागरूकता से रोका जा सकता है खतरा



नई दिल्ली। थैलेसीमिया एक गंभीर आनुवंशिक (जेनेटिक) रक्त विकार है, जो माता-पिता से बच्चों में विरासत में मिलता है। इस बीमारी में शरीर पर्याप्त मात्रा में सामान्य हीमोग्लोबिन नहीं बना पाता, जिसके कारण खून की कमी (एनीमिया) हो जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, से पीड़ित बच्चों को जीवनभर विशेष चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता पड़ सकती है।


थैलेसीमिया कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, बल्कि यह जीन के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंचती है। यदि माता और पिता दोनों थैलेसीमिया माइनर (वाहक) हों, तो उनके बच्चे में थैलेसीमिया मेजर होने का खतरा बढ़ जाता है।


बच्चों में कैसे होती है यह बीमारी?


विशेषज्ञ बताते हैं कि जब माता-पिता दोनों में थैलेसीमिया से जुड़ा दोषपूर्ण जीन मौजूद होता है, तब जन्म लेने वाले बच्चे में गंभीर थैलेसीमिया होने की संभावना रहती है। ऐसे बच्चों को जन्म के कुछ महीनों बाद ही खून की कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।


थैलेसीमिया के प्रमुख लक्षण



शरीर में अत्यधिक कमजोरी और थकान।


चेहरा पीला पड़ना।


बच्चों की शारीरिक वृद्धि धीमी होना।


बार-बार संक्रमण होना।


सांस फूलना।


भूख कम लगना।


लीवर और प्लीहा (स्प्लीन) का बढ़ जाना।


हड्डियों के विकास में असामान्यता।




इलाज क्या है?


थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को नियमित अंतराल पर रक्त चढ़ाने (ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की जरूरत पड़ सकती है। इसके साथ ही शरीर में आयरन की अधिकता को नियंत्रित करने के लिए विशेष दवाएं दी जाती हैं। कुछ मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी स्थायी उपचार का विकल्प बन सकता है।

बचाव का सबसे प्रभावी तरीका

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि थैलेसीमिया की रोकथाम के लिए विवाह से पहले या परिवार शुरू करने से पहले थैलेसीमिया स्क्रीनिंग कराना बेहद जरूरी है। यदि दोनों संभावित माता-पिता थैलेसीमिया माइनर हों, तो उन्हें जेनेटिक काउंसलिंग की सलाह दी जाती है।

जागरूकता है सबसे बड़ा हथियार

विशेषज्ञों के अनुसार, थैलेसीमिया के खिलाफ लड़ाई में जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण है। समय पर जांच, सही परामर्श और नियमित उपचार से मरीज बेहतर जीवन जी सकते हैं। वहीं, विवाह पूर्व जांच और जेनेटिक काउंसलिंग के जरिए आने वाली पीढ़ियों को इस गंभीर बीमारी से बचाया जा सकता है।

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