प्रणव बजाज
देश की राजनीति में इन दिनों एक नई फुसफुसाहट चल रही है—क्षेत्रीय दलों को कांग्रेस में विलय कर लेना चाहिए। सुनने में यह सलाह कम और आपातकालीन चिकित्सा अधिक लगती है। विपक्ष की हालत देखकर लगता है कि डॉक्टरों ने कह दिया हो, "मरीजों को अलग-अलग रखने से फायदा नहीं, सबको एक ही वार्ड में भर्ती कर दो।"
कभी कांग्रेस पूरे देश पर छाई रहती थी। आज हाल यह है कि पार्टी अपने पुराने वोटरों को ऐसे ढूंढ रही है जैसे कोई व्यक्ति पुराने मोबाइल में सेव नंबर खोजता है और हर बार जवाब आता है—"यह नंबर अब अस्तित्व में नहीं है।"
राहुल गांधी देशभर में यात्राएं निकाल रहे हैं, भाषण दे रहे हैं, मुद्दे उठा रहे हैं, लेकिन चुनावी नतीजे आते ही भाजपा ऐसे मुस्कुरा देती है जैसे शिक्षक ने पूरी क्लास की कॉपियां जांच ली हों और टॉपर का नाम पहले से ही तय हो।
उधर क्षेत्रीय दलों का भी कमाल देखिए। हर पार्टी खुद को प्रधानमंत्री बनाने की क्षमता रखती है, बस जनता को छोड़कर कोई और इस बात पर विश्वास नहीं करता। पांच सांसद वाली पार्टी भी प्रधानमंत्री पद का सपना देखती है और दस सीटों वाली पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व की दावेदार बन जाती है।
भ्रष्टाचार पर भाषण देने वाले कई दलों की फाइलें खुद इतनी मोटी हैं कि उन्हें पढ़ने के लिए अलग मंत्रालय बनाना पड़े। परिवारवाद के खिलाफ आवाज उठाने वाले दलों में भी अक्सर अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, महासचिव, युवा अध्यक्ष और भविष्य के अध्यक्ष एक ही परिवार से निकल आते हैं। लोकतंत्र कम, पारिवारिक लिमिटेड कंपनी ज्यादा दिखाई देती है।
विपक्ष की सबसे बड़ी समस्या भाजपा नहीं, बल्कि विपक्ष खुद है। एक नेता दूसरे को स्वीकार नहीं करता, दूसरा तीसरे को नहीं मानता और तीसरा खुद को ही प्रधानमंत्री घोषित कर चुका होता है। जनता महंगाई, रोजगार और विकास पर बहस सुनना चाहती है, लेकिन विपक्ष की बैठकों में आधा समय कुर्सी तय करने में और बाकी आधा समय प्रेस कॉन्फ्रेंस की फोटो में कौन बीच में बैठेगा, यह तय करने में निकल जाता है।
भाजपा के लिए शायद सबसे बड़ी चुनावी रणनीति अब चुनाव प्रचार नहीं, बल्कि विपक्ष को उसके हाल पर छोड़ देना है। विपक्ष खुद ही इतने प्रयोग कर लेता है कि अलग से किसी रणनीति की जरूरत नहीं पड़ती।
स्थिति यह है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को साथ लाना चाहती है, क्षेत्रीय दल कांग्रेस को छोटा भाई बनाना चाहते हैं और जनता दोनों को देखकर पूछ रही है—"भाई, सरकार का विकल्प कौन है?"
अगर यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में राजनीति विज्ञान की किताबों में एक नया अध्याय पढ़ाया जाएगा—"भारतीय विपक्ष: एक अध्ययन, एक संघर्ष और कई महत्वाकांक्षाएं।"
और तब इतिहासकार लिखेंगे—"भाजपा चुनाव जीतती रही, जबकि विपक्ष यह तय करता रहा कि हार का प्रेस नोट कौन जारी करेगा।"
यह एक राजनीतिक व्यंग्य है, जिसका उद्देश्य समसामयिक राजनीति पर कटाक्ष करना है।


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