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महंगाई और मानसून की दोहरी मार! FY27 में 6.5% रह जाएगी देश की रफ्तार; क्या पास होगा जीडीपी का ‘क्रूड टेस्ट’?A double whammy of inflation and monsoon! India's growth rate will be 6.5% in FY27; will it pass the 'crude test' of GDP?

 

बढ़ती लागत, कमजोर मानसून की आशंका और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की आर्थिक विकास दर पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 (FY27) में देश की जीडीपी वृद्धि दर घटकर करीब 6.5 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि यह दर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के मुकाबले अब भी मजबूत मानी जाएगी, लेकिन पिछले वर्षों की तुलना में रफ्तार कुछ धीमी पड़ने के संकेत हैं।



विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की कीमतों में संभावित उछाल भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की लागत बढ़ती है। इसका सीधा असर महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ता है।

दूसरी ओर, मौसम विभाग और वैश्विक एजेंसियों की रिपोर्टों में मानसून को लेकर भी चिंता जताई जा रही है। यदि वर्षा सामान्य से कम रहती है तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी और ग्रामीण मांग में कमजोरी देखने को मिल सकती है। कृषि क्षेत्र की सुस्ती का असर देश की समग्र अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव, व्यापारिक अनिश्चितताएं और विकसित देशों में आर्थिक सुस्ती भी भारतीय निर्यात और निवेश के लिए चुनौती बन सकती हैं। अमेरिका, यूरोप और पश्चिम एशिया की परिस्थितियां भारतीय बाजार पर लगातार प्रभाव डाल रही हैं।

हालांकि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। वित्त वर्ष 2026 के अंत में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है। मजबूत सरकारी पूंजीगत व्यय, बैंकिंग क्षेत्र की बेहतर स्थिति, कॉर्पोरेट निवेश में बढ़ोतरी और घरेलू उपभोग की मजबूती आने वाले वर्ष के लिए सकारात्मक आधार तैयार कर रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि निजी खपत और निवेश की गति बनी रही तो तमाम चुनौतियों के बावजूद भारत की विकास दर 6 प्रतिशत से ऊपर रह सकती है। लेकिन असली परीक्षा कच्चे तेल की कीमतों और मानसून की स्थिति से होगी। यदि दोनों मोर्चों पर झटका लगता है तो आर्थिक वृद्धि पर दबाव बढ़ सकता है।

क्या है जीडीपी का ‘क्रूड टेस्ट’?

अर्थशास्त्रियों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की कीमतें किसी ‘लिटमस टेस्ट’ से कम नहीं हैं। यदि तेल सस्ता रहता है तो महंगाई नियंत्रण में रहती है, आयात बिल कम होता है और सरकार के वित्तीय संतुलन को राहत मिलती है। लेकिन तेल महंगा होने पर महंगाई, चालू खाते का घाटा और राजकोषीय दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि FY27 में भारत की आर्थिक सेहत का सबसे बड़ा पैमाना ‘क्रूड टेस्ट’ माना जा रहा है।

फिलहाल उम्मीद बरकरार है, लेकिन महंगाई, मानसून और वैश्विक हालात के बीच भारत की विकास यात्रा के सामने चुनौतियों का नया दौर खड़ा है। अब सबकी निगाहें तेल बाजार और आसमान से बरसने वाली बूंदों पर टिकी हैं।

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