प्रयागराज से एक अहम न्यायिक खबर सामने आई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ऐसे कानून के तहत तलाक दे दिया गया था, जो अस्तित्व में ही नहीं है।
अदालत ने कहा कि किसी भी न्यायालय का दायित्व है कि वह केवल वैध और लागू कानूनों के आधार पर ही फैसला सुनाए। यदि कोई कानून मौजूद ही नहीं है, तो उसके आधार पर दिया गया आदेश पूरी तरह अवैध माना जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह के आदेश न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने तलाक का आदेश देते समय ऐसे प्रावधान का हवाला दिया, जो भारतीय कानून में मान्य ही नहीं है। इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों को कानून की सही जानकारी और उसकी सीमाओं का पूरा ध्यान रखना चाहिए।
अदालत ने यह भी कहा कि न्यायिक फैसलों में लापरवाही या गलत कानून का इस्तेमाल सीधे तौर पर पक्षकारों के अधिकारों को प्रभावित करता है, इसलिए ऐसे मामलों में सतर्कता बेहद जरूरी है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का आदेश निरस्त करते हुए मामले को दोबारा सुनवाई के लिए वापस भेज दिया।
इस फैसले को न्यायिक जवाबदेही और कानूनी प्रक्रिया की शुद्धता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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