सम्पादकीय
हर चुनाव से पहले अचानक “नारी शक्ति” की याद आना क्या सच में संवेदनशीलता है, या यह सिर्फ वोट बैंक की राजनीति का पुराना नुस्खा? “नारी वंदन” के नाम पर बहने वाले आंसू अब इतने घिसे-पिटे लगने लगे हैं कि उनमें संवेदना कम और स्वार्थ ज्यादा झलकता है।
सत्ता के गलियारों में महिलाओं के सम्मान की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, योजनाओं के नाम रखे जाते हैं, मंचों से तालियां बजती हैं — लेकिन जमीनी हकीकत आज भी सवाल पूछती है। क्या महिलाओं की सुरक्षा वाकई प्राथमिकता है, या सिर्फ भाषणों की शोभा?
हर बार एक नया नारा, एक नया अभियान, एक नया वादा… और फिर वही पुरानी कहानी। कानून बनते हैं, घोषणाएं होती हैं, लेकिन क्रियान्वयन वहीं ठहर जाता है जहां से शुरुआत हुई थी। “नारी वंदन” का यह शोर कई बार उस सच्चाई को दबा देता है, जहां महिलाएं रोजमर्रा की असुरक्षा, भेदभाव और संघर्ष से जूझ रही हैं।
विडंबना यह है कि जो सिस्टम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा का दावा करता है, वही कई बार उनकी आवाज को नजरअंदाज भी कर देता है। आंकड़े बताते हैं कि अपराध कम होने के बजाय नए रूप में सामने आ रहे हैं, लेकिन सत्ता के दावे हमेशा “सब नियंत्रण में है” वाली तस्वीर पेश करते हैं।
यह सवाल उठाना जरूरी है कि क्या महिलाओं का सम्मान सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गया है? अगर सच में बदलाव लाना है, तो दिखावे से बाहर निकलकर ठोस कार्रवाई करनी होगी — पुलिस व्यवस्था से लेकर न्याय प्रक्रिया तक, हर स्तर पर जवाबदेही तय करनी होगी।
नारी वंदन अगर सच्चा है, तो वह नारे में नहीं, नीतियों के असर में दिखेगा। वरना यह “सम्मान” नहीं, सिर्फ सियासी स्वांग ही कहलाएगा — जिसमें आंसू भी नकली हैं और वादे भी।

Post a Comment