क्या गलवां के बाद पहली बार शी जिनपिंग भारत आएंगे?
भारत और चीन के रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने के संकेत एक बार फिर चर्चा में हैं। शी जिनपिंग के संभावित भारत दौरे की अटकलों ने कूटनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। करीब 82 महीने बाद अगर यह दौरा होता है, तो यह सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं बल्कि दोनों देशों के बीच संबंधों की दिशा तय करने वाला बड़ा संकेत माना जाएगा।
गलवां के बाद पहली बड़ी पहल?
साल 2020 में हुए गलवां घाटी संघर्ष ने भारत-चीन संबंधों को सबसे निचले स्तर पर पहुंचा दिया था। इसके बाद से ही दोनों देशों के बीच सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत तो जारी रही, लेकिन भरोसे की कमी साफ दिखती रही। ऐसे में जिनपिंग का संभावित भारत दौरा एक “आइस-ब्रेकर” साबित हो सकता है।
ब्रिक्स सम्मेलन बना बहाना या मौका?
आगामी ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को इस संभावित दौरे का प्रमुख कारण माना जा रहा है। भारत इस बार मेजबान की भूमिका में हो सकता है, और ऐसे में चीन के राष्ट्रपति की मौजूदगी अनिवार्य कूटनीतिक प्रोटोकॉल का हिस्सा भी हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह दौरा सिर्फ सम्मेलन तक सीमित रहेगा या द्विपक्षीय संबंधों में नई शुरुआत भी करेगा?
क्या सच में पिघल रही है बर्फ?
हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच कुछ सकारात्मक संकेत देखने को मिले हैं—
सीमा पर तनाव कम करने को लेकर सैन्य वार्ताएं
व्यापारिक संबंधों में स्थिरता
बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग
लेकिन इसके बावजूद सीमा विवाद, रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय प्रभाव की होड़ जैसे मुद्दे अब भी जस के तस हैं।
भारत की रणनीति क्या होगी?
नरेंद्र मोदी सरकार के सामने चुनौती यह होगी कि वह कूटनीतिक संतुलन बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा से कोई समझौता न करे। भारत “वॉच एंड एंगेज” की नीति पर चल रहा है—जहां बातचीत भी जारी है और सतर्कता भी।
संकेत सकारात्मक, लेकिन सतर्कता जरूरी
शी जिनपिंग का संभावित भारत दौरा निश्चित रूप से एक बड़ा कूटनीतिक घटनाक्रम होगा। लेकिन यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इससे दोनों देशों के रिश्ते पूरी तरह सामान्य हो जाएंगे।भारत-चीन संबंधों की वास्तविक परीक्षा सीमा पर शांति, विश्वास निर्माण और दीर्घकालिक सहयोग में छिपी है—जहां हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा।

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