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प्रचंड गर्मी का खतरा: क्या भारत ‘सुपर एल नीनो’ के लिए तैयार है?The Threat of Extreme Heat: Is India Prepared for a ‘Super El Niño’?

 

सम्पादकीय


भारत में गर्मी का मौसम अभी पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ और हालात चिंताजनक दिखने लगे हैं। नदियों का जलस्तर घट रहा है, जलाशयों में पानी आधे से भी कम रह गया है और मौसम वैज्ञानिक ‘सुपर एल नीनो’ की आशंका जता रहे हैं। यह सिर्फ एक मौसमी बदलाव नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में गहराते जल संकट और भीषण गर्मी का संकेत है।


El Niño कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन जब यह ‘सुपर’ रूप लेता है तो इसके असर कहीं ज्यादा व्यापक और खतरनाक हो जाते हैं। प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि का सीधा प्रभाव भारत के मानसून और तापमान पर पड़ता है। इसका मतलब है—कम बारिश, लंबा सूखा और रिकॉर्ड तोड़ गर्मी।

इस बार चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि देश के प्रमुख जलाशयों की स्थिति पहले से ही कमजोर है। गर्मी बढ़ने के साथ पानी की मांग तेजी से बढ़ेगी—पीने के लिए, खेती के लिए और बिजली उत्पादन के लिए। लेकिन जब भंडारण ही कम होगा, तो संकट और गहरा होगा। कई राज्यों में अभी से पानी की कटौती और टैंकर निर्भरता के संकेत दिखने लगे हैं।

गर्मी का असर केवल असुविधा तक सीमित नहीं रहता। यह स्वास्थ्य संकट भी बन सकता है। हीटवेव के कारण बुजुर्गों, बच्चों और मजदूर वर्ग पर सबसे ज्यादा असर पड़ता है। शहरों में ‘हीट आइलैंड’ प्रभाव हालात को और खराब करता है, जहां कंक्रीट और ट्रैफिक तापमान को कई डिग्री तक बढ़ा देते हैं।

सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हम हर साल इन चेतावनियों को सुनते हैं, लेकिन तैयारी अधूरी ही रहती है। जल संरक्षण की योजनाएं कागजों में सिमट जाती हैं, शहरी जल प्रबंधन कमजोर रहता है और भूजल का अंधाधुंध दोहन जारी रहता है।

अब वक्त है कि सरकार और समाज दोनों मिलकर इसे गंभीरता से लें। जलाशयों के बेहतर प्रबंधन, वर्षा जल संचयन, सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा और शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने जैसे कदम तुरंत उठाने होंगे। साथ ही आम नागरिकों को भी पानी के उपयोग को लेकर जिम्मेदारी दिखानी होगी।

सुपर एल नीनो को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसके प्रभाव को कम जरूर किया जा सकता है। सवाल यह है कि क्या हम इस बार सिर्फ संकट का इंतजार करेंगे या उससे पहले ही तैयारी कर

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