मध्य प्रदेश के रीवा जिले में लोक निर्माण विभाग (PWD) से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने विभागीय कार्यप्रणाली और ठेके व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि 10 करोड़ रुपए से कम लागत वाले निर्माण कार्यों में भी प्राइस एस्केलेशन (कीमतों में बढ़ोतरी के आधार पर अतिरिक्त भुगतान) देने की सिफारिश की जा रही है, जबकि सामान्य नियमों में ऐसा प्रावधान नहीं होता।
दरअसल, प्राइस एस्केलेशन का लाभ आमतौर पर बड़े प्रोजेक्ट्स में दिया जाता है, जहां लंबे समय तक काम चलता है और इस दौरान सीमेंट, सरिया, डीजल जैसी निर्माण सामग्री की कीमतों में उतार-चढ़ाव होता है। लेकिन छोटे और कम अवधि वाले प्रोजेक्ट्स (10 करोड़ से नीचे) में यह सुविधा लागू नहीं होती, ताकि सरकारी खर्च नियंत्रित रहे।
रीवा में सामने आए इस मामले में बताया जा रहा है कि कुछ ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के लिए विभागीय स्तर पर फाइलें आगे बढ़ाई गईं और नियमों को दरकिनार करते हुए प्राइस एस्केलेशन की सिफारिश की गई। यही वजह है कि अब इस पूरे मामले को “सिस्टम की सेटिंग” के तौर पर देखा जा रहा है।
इस घटनाक्रम से कई गंभीर सवाल उठते हैं—क्या विभागीय अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी की? क्या यह किसी विशेष ठेकेदार को लाभ पहुंचाने की कोशिश है? और अगर ऐसा है, तो इससे सरकारी खजाने पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ेगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि छोटे प्रोजेक्ट्स में भी इस तरह एस्केलेशन देना शुरू हो गया, तो यह एक खतरनाक परंपरा बन सकती है। इससे न सिर्फ लागत बढ़ेगी, बल्कि भविष्य में ठेकेदार जानबूझकर प्रोजेक्ट्स में देरी करके ज्यादा भुगतान लेने की कोशिश भी कर सकते हैं।
फिलहाल इस मामले के सामने आने के बाद विभाग की कार्यशैली पर निगरानी बढ़ सकती है और उच्च स्तर पर जांच की मांग भी तेज हो सकती है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई भी संभव है।

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