Top News

वंदे मातरम पर सियासत: देशभक्ति नारे से तय होगी या नीयत से?Politics over 'Vande Mataram': Will patriotism be defined by slogans or by intent?”

 “

एक तरफ नारे को राष्ट्रभक्ति का पैमाना बनाने की जिद, दूसरी तरफ धर्म के नाम पर दूरी—आखिर देश किस रास्ते पर जा रहा है?

प्रणव बजाज

देश में एक बार फिर वही पुराना लेकिन भड़काऊ सवाल हवा में है—“वंदे मातरम बोलोगे या नहीं?”

और इसके साथ ही एक और खतरनाक लाइन जुड़ जाती है—“अगर नहीं बोलते तो पाकिस्तान चले जाओ।”


यहीं से असली राजनीति शुरू होती है।

क्या अब भारत में देशभक्ति का प्रमाणपत्र किसी नारे से मिलेगा?

क्या संविधान से ऊपर अब “स्लोगन टेस्ट” लागू हो गया है?

अगर हाँ, तो कल को कौन सा नया नारा लाकर नागरिकता की परीक्षा ली जाएगी?

सच यह है कि “वंदे मातरम” और “भारत माता की जय” इस देश के गौरवशाली इतिहास से जुड़े नारे हैं। आजादी की लड़ाई में इनकी गूंज ने अंग्रेजों की नींद उड़ाई थी। लेकिन आज इन्हीं नारों को लेकर अपने ही लोगों के बीच दीवार खड़ी की जा रही है।

एक पक्ष खुलकर कहता है—“नहीं बोलोगे तो इस देश में रहने का हक नहीं।”

दूसरा पक्ष धर्म का हवाला देकर इन नारों से दूरी बनाता है।

दोनों ही तरफ सवाल उठते हैं।

जो लोग हर मंच से देशभक्ति के नारे लगाते हैं, क्या उनकी देशभक्ति पर कभी सवाल नहीं उठना चाहिए?

क्या भ्रष्टाचार, अपराध या समाज को बांटने वाली राजनीति करने के बाद भी सिर्फ “वंदे मातरम” बोल देने से सब पाप धुल जाते हैं?

और जो लोग इन नारों से दूरी बनाते हैं, क्या उन्हें यह नहीं समझना चाहिए कि यह देश केवल एक धर्म का नहीं, बल्कि साझा विरासत का प्रतीक है?

क्या कोई ऐसा रास्ता नहीं निकल सकता, जहां आस्था भी बनी रहे और राष्ट्र के प्रति सम्मान भी साफ दिखाई दे?

कटाक्ष यही है—देशभक्ति आज एक “शोर” बन चुकी है।

जिसकी आवाज ऊंची, वही बड़ा देशभक्त!

लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है।

देश नारे से नहीं चलता…

देश चलता है उस किसान से जो खेत में पसीना बहा रहा है,

उस जवान से जो सीमा पर जान दांव पर लगा रहा है,

और उस आम नागरिक से जो ईमानदारी से अपना फर्ज निभा रहा है।

“पाकिस्तान चले जाओ” कहना आसान है,

लेकिन यह भूल जाना खतरनाक है कि भारत किसी एक सोच, एक धर्म या एक नारे की जागीर नहीं है।

यह देश संविधान से चलता है,

और संविधान हर नागरिक को अपनी बात कहने, मानने और जीने का अधिकार देता है।

अंतिम बात

अगर देशभक्ति को सच में मजबूत बनाना है,

तो उसे नारों की भीड़ से निकालकर जिम्मेदारी और सम्मान के दायरे में लाना होगा।

वरना वह दिन दूर नहीं जब लोग देश के लिए कम और एक-दूसरे के खिलाफ ज्यादा खड़े नजर आएंगे—

और तब “वंदे मातरम” भी सिर्फ एक नारा रह जाएगा, भावना नहीं।

Post a Comment

Previous Post Next Post