बेंगलुरु में आयोजित न्यायिक अधिकारियों के राज्य स्तरीय सम्मेलन में बी. वी. नागरत्ना ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर जोर देते हुए सख्त टिप्पणी की। उन्होंने साफ कहा कि जो जज लालच और प्रलोभन का शिकार हो जाते हैं, उन्हें व्यवस्था से बाहर किया जाना चाहिए।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि किसी भी जज का दागदार फैसला न केवल उसकी छवि को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि पूरी न्यायपालिका पर भी सवाल खड़े करता है। उन्होंने न्यायाधीशों से अपील की कि वे बाहरी दबावों और सहकर्मियों के प्रभाव से मुक्त रहकर निष्पक्ष निर्णय लें।
सम्मेलन में उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता केवल बाहरी दबावों से मुक्त होने तक सीमित नहीं है, बल्कि आधुनिक दौर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के प्रभाव से भी संतुलन बनाए रखना जरूरी है। उनके मुताबिक, एआई एक सहायक उपकरण हो सकता है, लेकिन निर्णय लेने का अंतिम अधिकार हमेशा न्यायाधीशों के पास ही रहना चाहिए।
उन्होंने जिला न्यायपालिका को लेकर भी महत्वपूर्ण बात कही कि जजों को अपने कार्य में सुरक्षित और समर्थित महसूस होना चाहिए। इसके लिए उच्च न्यायालयों को पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन सुनिश्चित करना होगा, खासकर पदोन्नति, तबादले और नियुक्तियों जैसे मामलों में।
महिला न्यायाधीशों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर देते हुए जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि उनके लिए सुरक्षित, सम्मानजनक और अनुकूल कार्य वातावरण बनाना बेहद जरूरी है। इसमें बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ संस्थागत संवेदनशीलता भी शामिल होनी चाहिए।
इस कार्यक्रम में सूर्यकांत, सिद्धारमैया, अरविंद कुमार और विभू बाखरू सहित न्यायपालिका और प्रशासन के कई वरिष्ठ सदस्य मौजूद रहे।
जस्टिस नागरत्ना का संदेश साफ था—न्यायपालिका की मजबूती के लिए ईमानदारी, स्वतंत्रता और मानवीय विवेक सबसे अहम हैं, और किसी भी स्तर पर इनसे समझौता नहीं होना चाहिए।

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