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धार की भोजशाला का इतिहास मस्जिद से सैकड़ों साल पुराना, हिंदू फ्रंट फार जस्टिस के वकील ने कोर्ट में उठाए सवालThe history of Bhojshala in Dhar is hundreds of years older than the mosque, a lawyer representing the Hindu Front for Justice raised questions in court



धार भोजशाला मामले में सोमवार से शुरू हुई सुनवाई में नई-नई जानकारी सामने आ रही है। हिंदू फ्रंट फार जस्टिस की ओर से पैरवी कर रहे एडवोकेट विष्णुशंकर जैन ने कोर्ट के समक्ष लगभग दो घंटे तक अपनी बात रखी।

उन्होंने भोजशाला का इतिहास बताते हुए कहा कि भोजशाला का इतिहास मस्जिद से सैकड़ों साल पुराना है। हवन कुंड, खंभों पर संस्कृत के श्लोक जैसे कई तथ्य मिले हैं, जिनका मस्जिद में कोई काम ही नहीं है। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में अनेक दस्तावेज भी प्रस्तुत किए।

उन्होंने कहा कि अगस्त 1935 में पहली बार भोजशाला में नमाज की अनुमति दी गई थी। इसके पहले परिसर में कभी नमाज नहीं हुई थी। भोजशाला को अधिनियम के प्रविधानों के तहत राष्ट्रीय महत्व की संरक्षित धरोहर घोषित किया गया है। बावजूद इसके धार्मिक चरित्र को बदलने का प्रयास किया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) के सर्वे में भोजशाला में संस्कृत यंत्र, सूर्य, हवन कुंड मिला है। सुनवाई के दौरान कुतुबमीनार का उल्लेख भी हुआ।

जैन ने कोर्ट को बताया कि भोजशाला में संस्कृत का व्याकरण यंत्रों के माध्यम से सिखाया जाता था। राजा भोज ने इसका निर्माण कराया था और इतिहास की पुस्तकों में भोजशाला को लेकर बहुत कुछ लिखा गया है।

1935 में हुआ कुछ ऐसा कि यहां नमाज पढ़ी जाने लगी

जैन ने कोर्ट को बताया कि अगस्त 1935 से पहले तक भोजशाला को लेकर कोई विवाद नहीं था। यहां नमाज नहीं पढ़ी जाती थी, लेकिन अगस्त 1935 में यहां की प्रतिमाएं, भोजशाला का बोर्ड आदि बाहर कर दिया गया। यह बात वे नहीं कह रहे हैं बल्कि शासन की ओर से प्रस्तुत शपथ पत्र में सामने आई है।

उन्होंने कहा कि भोजशाला से सिर्फ एक प्रतिमा नहीं बल्कि दो प्रतिमाएं विदेश गई थीं। भोजशाला में संस्कृत को आसान भाषा में पढ़ाने की व्यवस्था थी।

एएसआइ सर्वे में सामने आए भोजशाला के प्रमुख प्रमाण

धार स्थित भोजशाला प्रकरण में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) द्वारा किए गए सर्वे में कई ऐसे संकेत सामने आए हैं, जिन्हें मंदिर संरचना से जोड़कर देखा जा रहा है।

एएसआइ की रिपोर्ट के अनुसार, परिसर में मौजूद स्तंभ, छत और दीवारों पर कमल और देवी-देवताओं से जुड़े प्रतीकों की नक्काशी पाई गई है, जो पारंपरिक हिंदू मंदिर वास्तुकला की ओर इशारा करती है।

सर्वे में सरस्वती से संबंधित प्रतिमाओं और खंडित मूर्ति अवशेषों के संकेत भी मिले हैं, जिससे इसे विद्या की देवी सरस्वती के मंदिर के रूप में जोड़ा जा रहा है।

इसके अलावा परिसर में संस्कृत भाषा और प्राचीन देवनागरी लिपि में शिलालेख मिलने की बात सामने आई है, जिनमें धार्मिक और शैक्षणिक गतिविधियों के उल्लेख होने के संकेत बताए गए हैं।

परिसर के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में पत्थरों से बनी दीवार जैसी संरचना भी मिली है। नींव में पत्थर-ईंट की परतें, सिक्के व स्थापत्य अवशेष मिले हैं। खोदाई में पत्थर व ईंटों की दीवारें, मंच, फर्श की परतें और कई 
स्थापत्य अवशेष सामने आए हैं। इनसे परिसर में अलग-अलग कालखंडों में निर्माण व पुनर्निर्माण के प्रमाण मिलते हैं।

कुछ अवशेष राजा भोज के काल यानी 11वीं शताब्दी से जुड़े होने के संकेत देते हैं। साल 2024 में सर्वे के दौरान सात ट्रेंच और कुछ परीक्षण गड्ढों में खोदाई की गई थी। मलबा हटाने पर मूर्तियों के टुकड़े और घरेलू वस्तुएं मिलीं मलबा हटाने के दौरान मूर्तिकला के खंड, स्थापत्य अवयव, सिक्के और अंगूठियां मिलीं। अनाज पीसने के पाट, ओखली-मूसल जैसी घरेलू वस्तुएं भी सामने आईं।

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