Top News

ममता से मोदी तक… पश्चिम बंगाल के चुनाव में कौन कितना ताक़तवरFrom Mamata to Modi… Who Holds How Much Power in the West Bengal Elections?

 

संम्पादकीय : प्रणव बजाज

पश्चिम बंगाल का चुनाव हमेशा से केवल सत्ता परिवर्तन का सवाल नहीं रहा, बल्कि यह विचारधारा, पहचान और राजनीतिक मॉडल की सीधी टक्कर रहा है। 2026 का चुनाव भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाता दिख रहा है, जहां एक ओर ममता बनर्जी की क्षेत्रीय पकड़ और “बंगालियत” का नैरेटिव है, तो दूसरी ओर नरेंद्र मोदीके नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय विस्तार और सत्ता परिवर्तन का दावा


2011 से सत्ता में काबिज TMC ने बंगाल की राजनीति को पूरी तरह अपने ढंग से ढाला है। 2021 के विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत के साथ वापसी ने यह साबित किया कि ममता बनर्जी की जमीनी पकड़ अब भी मजबूत है। खासकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के बीच उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। उनकी सरकार की वेलफेयर योजनाएं—जैसे लक्ष्मी भंडार और अन्य सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम—ने बड़े वर्ग को सीधे जोड़े रखा है। इसके साथ ही “बाहरी बनाम बंगाल” का राजनीतिक नैरेटिव भी TMC की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत बना हुआ है।

हालांकि, लंबे समय तक सत्ता में रहने के कारण एंटी-इन्कंबेंसी एक वास्तविक चुनौती बनती जा रही है। शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला और नारदा जैसे मामलों ने सरकार की छवि पर असर डाला है। कानून-व्यवस्था और चुनावी हिंसा के मुद्दे भी विपक्ष को लगातार हमले का मौका देते हैं। यही वे बिंदु हैं जहां भाजपा अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

दूसरी तरफ भाजपा ने पिछले एक दशक में बंगाल में जो विस्तार किया है, वह अभूतपूर्व है। 2016 में लगभग नगण्य उपस्थिति से 2021 में मुख्य विपक्ष बनना इस बात का संकेत है कि पार्टी अब केवल चुनौती नहीं, बल्कि विकल्प के रूप में खुद को स्थापित कर चुकी है। नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, केंद्र सरकार की योजनाएं और “डबल इंजन” का वादा भाजपा के अभियान की रीढ़ हैं। इसके अलावा अमित शाह और स्थानीय नेताओं की आक्रामक रणनीति ने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया है।

फिर भी भाजपा की अपनी सीमाएं हैं। सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि राज्य स्तर पर ममता बनर्जी जैसा सर्वमान्य चेहरा पार्टी के पास नहीं है। साथ ही “बाहरी पार्टी” की छवि अभी भी एक हद तक भाजपा को नुकसान पहुंचाती है। बंगाल की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के मुद्दे पर TMC को स्वाभाविक बढ़त मिलती है।

इस चुनाव का असली संघर्ष दो मॉडलों के बीच है—एक तरफ क्षेत्रीय अस्मिता और वेलफेयर आधारित राजनीति, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय विकास और मजबूत केंद्र के साथ तालमेल का वादा। बेरोजगारी, महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार और पहचान की राजनीति जैसे मुद्दे चुनाव को दिशा देंगे। मतदाता अब केवल भावनात्मक अपील ही नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता और भविष्य की संभावनाओं को भी तौल रहा है।

निष्कर्ष के तौर पर देखा जाए तो ममता बनर्जी अभी भी इस मुकाबले में बढ़त बनाए हुए नजर आती हैं, क्योंकि उनकी जमीनी पकड़ और स्थापित वोट बैंक मजबूत है। लेकिन भाजपा की चुनौती को कम करके आंकना बड़ी भूल होगी। यदि चुनाव का फोकस भ्रष्टाचार और विकास के मुद्दों पर केंद्रित होता है, तो भाजपा संतुलन बदल सकती है। वहीं यदि चुनाव क्षेत्रीय पहचान और सामाजिक योजनाओं पर टिका रहता है, तो ममता बनर्जी की स्थिति और मजबूत हो सकती है।

अंततः पश्चिम बंगाल का यह चुनाव केवल सरकार बदलने या बचाने का नहीं, बल्कि यह तय करने का है कि राज्य की राजनीति आगे भी क्षेत्रीय प्रभाव में रहेगी या राष्ट्रीय धारा में पूरी तरह शामिल होगी। यही इस मुकाबले को देश के सबसे अहम चुनावी रणक्षेत्रों में से एक बनाता है।

Post a Comment

Previous Post Next Post