• रवि उपाध्याय
जब से यह गाना सुना है तब से इस गाने पर मेरा चिंतन मनन और स्पेशल इंटेंसिव रीडिंग चल रही है कि आखिर नायिका इस गाने में नायक से क्या कह रही है। वह नायक जिसका नाम शायद राजा रहा होगा से कुंडी खड़काने से क्यों मना कर रही है ? क्या नायिका पर्यावरण प्रेमी है जो नायक को कुंडी न खड़काने का इंस्ट्रक्शन दे रही है या बोल्डनेस होने के बावजूद भी नायिका में इतनी शर्म-ओ- हया बाकी है कि वह समाज के डर से लोक लाज की इज्जत बनाए रखने के लिए नायक से कुंडी खड़काने को मना कर रही है। यह बहुत ही खुशी की बात है कि नायिका लोक संस्कृति के प्रति इतनी जागरूक है कि वह नायक से कुंडी न खड़काने कि रिक्वेस्ट कर रही है।
इसका एक पहलू यह भी हो सकता है कि नायिका पर्यावरण प्रेमी हो और वह नहीं चाहती हो कि क्षेत्र में ध्वनि प्रदूषण हो। जिससे लोगों की निद्रा में खलल पड़े और लोग जाग जाएं। नायिका जानती है कि क्षेत्र के मर्द भले ही यह देख सुनकर अनदेखा कर देंगे, पर आसपास की बैकवर्ड लेडीज़ का क्या ? वो तो सारे मोहल्ले में खुसुर पुसुर कर उसे बदनाम कर सकतीं हैं। यह सब जानकर मन को कितना सुकून मिलता है कि नायिका कितनी समझदार है जो इतना सोच समझ कर कदम उठा रही है। पहले की नारी में भला इतनी बोल्डनेस कहां होतीं थीं।
यह हमारे देश के लिए यह अत्यंत ही गौरव की बात है कि आज के जमाने में नायिका इतनी बोल्ड होने के बाद भी लोक लाज के प्रति इतनी चिंतित है। नारी के लोक लाज के प्रति यह सतर्कता तो हमारे देश के एक राज्य में मुख्यमंत्री में भी है। जिन्होंने नारी की लाज की रक्षा के लिए एक एक बीज मंत्र दिया है। उन्होंने अपने सूबे की महिलाओं और बहू बेटियों को सुझाव दिया है कि वो रात को आठ बजे के बाद सड़कों पर न निकला करें। यह हुई न,सौ बात की एक बात, न होगा बांस और न ही बजेगी बांसुरी। इसे कहते हैं कि हरड़ लगे न फिटकरी रंग चोखा का चोखा। यह एक महिला मुख्यमंत्री का नवाचार तो है ही साथ ही एक जिम्मेदार मां की तरह नसीहत भी है।
कुंडी मत खड़काओ राजा गाने पर काफ़ी गंभीर शोध करने के बाद पता चला है कि यह गाना 'गब्बर इज़ बैक' फिल्म का है और इसे नेहा कक्कड़ ने बड़े ही मादक अंदाज में गाया है। इस पाजी गाने को फिल्म में चित्रांगदा सिंह और अक्षय पाजी पर फिल्माया गया है। इस गीत को लिखा है कुंवर जुनेजा ने। वैसे दावा किया जाता है कि यह गाना एक बुंदेली गीत है। इसे जयराज सिंह राजा और रानी कुशवाहा ने कइयों वार मंचों पर पेश किया है। गायिका नेहा कक्कड़ तो स्वर कोकिला लता जी से भी अधिक समझदार हैं। सुनते हैं कि लता जी लोक लाज का ख्याल रख कर इस तरह के गीत गाने से मना कर देतीं थीं। शायद वे संस्कार की बेड़ियों में जकड़ी पुराने विचारों की रहीं होंगी। पर आज बोल्डनेस का ज़माना है। यह नारी सशक्तिकरण का युग है।नारी अब सबला हो गई है और नर अशक्त बन गया है। इसलिए इसे नेहा कक्कड़ ने खूब रस ले कर गया है।
अब चूंकि फिल्म का नायक 'गब्बर'है तो नायिका द्वारा उसे यह हिदायत देना पूरी तरह माकूल है, कि है राजा तुम कुंडी मत खड़काओ, बिना किसी लाज शर्म के सीधे अंदर आ जाओ। यहां किसी में भी तुम से कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं है। फिर तुम तो ठहरे गब्बर, भला तुम से कोई भी कुछ कहने की हिमाकत कैसे करेगा। यहां नारी की भले ही इज्ज़त लुट जाए, यहां कोई कुछ नहीं कहता है। उल्टे यहां लोग अपना मोबाइल निकाल कर वीडियो बनाने लगते हैं। गब्बर भाई यहां लोगों की आंखों का पानी सूख चुका है । यहां सब के सब बापू के तीन बंदरों के समान अपनी आंख, कान और मुंह बंद किए रहते हैं। यहां डगर डगर पर दुर्योधन और धृतराष्ट्र छुपे बैठे हैं। इसी कारण से तो शायद नायिका भी इतनी बोल्ड बन गई है। जो खुल्लम खुल्ला कह रही है.. कुंडी न खड़काओ राजा धीरे से अंदर आ जाओ राजा....!
नई पीढ़ी को शायद यह पता नहीं होगा कि आख़िर कुंडी किसे कहते हैं ? यह किस बला का नाम है। तो बता दें कि घरों के दरवाजे जिन्हें किवाड़ कहा जाता था। इन पर लोहे की एक सांकल लगी रहती थी । यह दो पुड़ वाले दरवाजे पर लगी होती थीं। जब दरवाजे पर ताला लगाना होता था सांकल को चौखट पर लगे कुंदे पर लगा कर ताला लगाया जाता था। अब घरों में भी एक पुड़ के सिंगल दरवाजे होते हैं, जिन पर एल ड्रॉप लगे होते हैं। वैसे घरों के अंदर जो छोटे कुएं बने होते हैं उन्हें भी कुंडी और कुइयां कहा जाता है।
इस गाने में पता चलता है कि नायिका के घर के दरवाजे पर कुंडी लगी होने से यह पता चलता है कि नायिका के घर में बिजली नहीं है। यदि ऐसा होता तो वहां आने वाले को कुंडी खड़काने की जरुरत नहीं पड़ती और पास पड़ोस के लोगों को कोई डिस्टरबेंस नहीं होता। इस गाने में नायिका की पीड़ा छुपी है। सरकार 100 प्रतिशत विद्युतीकरण का दावा करती है। पूछता है भारत - कि, नायिका के घर पर अब तक बिजली क्यों नहीं पहुंची है ? सरकार इसका जवाब दे। यह एक लेडी कि प्राइवेसी और अस्मिता का मामला है। विपक्षी दलों को इस तरफ ध्यान देना चाहिए यह पीड़ित नारी का मामला है। विपक्षी दलों को बता दें कि नायिका को मताधिकार ही प्राप्त नहीं है बल्कि अन्य वोटर्स को भी इंफ्लूएंस कर सकती है
एक और फिल्म में नायिका का बोल्ड अंदाज देखिए। नायिका नायक को वार्निंग देते हुए कहती है जो बीच बजरिया तूने मेरी जो पकड़ी बैंया, मैं सबको बोल दूंगी। गाने की यह पंक्तियां अंश फिल्म से ली गईं हैं और इसके गीतकार हैं समीर। गाने की पहली लाइन से लगता है कि नायिका नायक को चेतावनी दे रही है कि यदि ऐसी वैसी हरकत की तो वह सब को बोल देगी । इसके बाद गाने की अगली लाइन में नायिका को मिलन का फॉर्मूला देते हुए कहती है - जब रात मा कोई न जागे तू आइयो सैंया में खिड़की खोल दूंगी...। नायिका से यह लाइन सुन कर मन गद गद हो जाता है कि नायिका कितनी दयावान है जो नायक पर पसीज कर कह रही है कि है शूरवीर तुम रात में जब सब सो जाएं तब आना मैं खिड़की खोल दूंगी। नायिका सुप्रीम कोर्ट की तरह घुप रात में अपनी खिड़की खोलने की बात कर रही है।गाने में यह नारी सशक्तिकरण का बेहतरीन उदाहरण है।
यह गीतकार समीर भाई जो हैं गीतकार अंजान के सुपुत्र हैं। गीतकार अंजान ने 300 फ़िल्मों में 1500 से अधिक गीत लिखें हैं। इनमें ही एक फिल्म बहारें फिर भी आएंगी का खूबसूरत गीत है आपके हसीन रुख पर आज नया नूर है और डॉन फिल्म का गाना खई के पान बनारस वाला खुल जाए बंद अक्ल का ताला। इन्हीं अंजान के पुत्र समीर की अकल का ऐसा ताला खुला कि उन्होंने फिल्म अंश में नायिका से भरी रात में खिड़की ही खुलवा डाली।
फ़िल्मों में एक ज़माना वह भी था जब नायिका को, चांद देखने के बहाने से बुलाया जाता था। यहां तक कि भंवरे को भी कहा जाता था कि भंवरे...धीरे से आना बगियन में। भंवरा भी लोकलाज वाला हुआ करता था और धीरे से भनभन करता हुआ चुपचाप फूल पर जा बैठता था। अब नायक बीच सड़क पर ऑफर देता है.. चलती क्या नौ से बारह। लगता है कि नायक और नायिकाएं बहुत सशक्त हो गई हैं। वो कहती है कि आंख मारे, ओ लड़का आंख मारे।
लेकिन देखिए जमाना कितना बदल गया है। पहले के जमाने में कहते थे कि फिल्में समाज का दर्पण होतीं है। तब के जमाने का दर्पण आज के जमाने को देख लेता तो शायद वह खुद- ब -खुद टुकड़े - टुकड़े हो जाता। यह देख कर आज का इंसान पत्थर सा बन गया है और उसके संस्कार पथरा गए हैं। अब नायक गाता है चुपके चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है हम को वो गुजारा जमाना याद है '

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