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सस्ते ड्रोन, महंगी सुरक्षा: ईरान–इजरायल टकराव से भारत के लिए सबक”Cheap Drones, Costly Security: Lessons for India from the Iran–Israel Conflict

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सम्पादकीय


मिडिल ईस्ट में हालिया तनाव ने युद्ध की प्रकृति को एक बार फिर बदलते हुए दिखाया है। Iran द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे सस्ते, छोटे और सटीक ड्रोन ने Israel जैसी उन्नत एयर डिफेंस प्रणाली को चुनौती दी है। यह केवल दो देशों का सैन्य टकराव नहीं, बल्कि भविष्य के युद्ध का ट्रेलर है—जहां कम लागत वाली तकनीक, महंगे सुरक्षा ढांचे पर भारी पड़ती दिख रही है।


ड्रोन युद्ध की सबसे बड़ी खासियत है—कम लागत, अधिक प्रभाव। जहां पारंपरिक मिसाइल सिस्टम करोड़ों डॉलर खर्च करते हैं, वहीं ड्रोन हजारों या लाखों में तैयार हो जाते हैं। यदि बड़ी संख्या में इन्हें एक साथ भेजा जाए (swarm attack), तो दुनिया की सबसे मजबूत एयर डिफेंस भी दबाव में आ सकती है। यही रणनीति ईरान ने अपनाई—संख्या, सटीकता और लागत के संतुलन के साथ।

इस पूरे परिदृश्य से भारत के लिए कई अहम सबक निकलते हैं।

पहला, रक्षा रणनीति में बदलाव की जरूरत। भारत की सुरक्षा व्यवस्था लंबे समय तक पारंपरिक युद्ध—टैंक, लड़ाकू विमान और मिसाइल—के इर्द-गिर्द केंद्रित रही है। लेकिन अब खतरा आसमान से आने वाले छोटे, सस्ते और तेज ड्रोन का है। ऐसे में मल्टी-लेयर एयर डिफेंस के साथ-साथ एंटी-ड्रोन सिस्टम को प्राथमिकता देनी होगी।

दूसरा, स्वदेशी तकनीक पर जोर। भारत ने ड्रोन टेक्नोलॉजी में प्रगति जरूर की है, लेकिन अभी भी बड़े पैमाने पर उत्पादन और तैनाती में कमी है। हमें न सिर्फ ड्रोन बनाना होगा, बल्कि उन्हें AI और स्वार्म टेक्नोलॉजी से लैस करना होगा, ताकि जरूरत पड़ने पर हम भी समान रणनीति अपना सकें।

तीसरा, कम लागत वाली युद्ध नीति। हर खतरे का जवाब महंगे हथियारों से देना व्यावहारिक नहीं है। भारत को ऐसे समाधान विकसित करने होंगे जो कम लागत में बड़े खतरे को निष्क्रिय कर सकें—जैसे लेजर सिस्टम, रेडियो जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर।

चौथा, सिविल–मिलिट्री समन्वय। ड्रोन टेक्नोलॉजी का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र और स्टार्टअप्स के पास है। सरकार और सेना को मिलकर इस इकोसिस्टम को मजबूत करना होगा, ताकि तेजी से नवाचार हो सके।

हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि हर रिपोर्ट या दावा पूरी तरह सत्यापित नहीं होता। युद्ध के समय सूचनाएं अक्सर प्रोपेगेंडा का हिस्सा भी बनती हैं। फिर भी, यह साफ है कि ड्रोन अब युद्ध का भविष्य नहीं, बल्कि वर्तमान बन चुके हैं।


ईरान–इजरायल टकराव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आने वाले समय में युद्ध की जीत केवल ताकत से नहीं, बल्कि तकनीक, रणनीति और लागत के संतुलन से तय होगी। भारत के लिए यह एक चेतावनी भी है और अवसर भी—समय रहते खुद को बदलने का।

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