दिल्ली हाईकोर्ट ने DRI अधिकारी के खिलाफ जांच रद्द की
दिल्ली हाईकोर्ट ने लोकपाल का आदेश रद्द किया, जिसमें अधिकारी के खिलाफ CBI जांच का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने कहा कि ऐसा फैसला बिना स्पष्ट कारण बताए नहीं लिया जा सकता, खासकर तब जब पिछली जांच में अधिकारी को बेकसूर पाया गया हो। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की डिवीज़न बेंच ने अधिकारी द्वारा दायर रिट याचिका स्वीकार की और लोकपाल के 24 जुलाई, 2025 का आदेश रद्द किया, जहां तक वह उस अधिकारी से संबंधित था।
कोर्ट ने कहा, "जब ये सबूत याचिकाकर्ता के पक्ष में थे तो कानून के तहत लोकपाल के लिए यह ज़रूरी था कि वह कारण बताए कि इन बेकसूर साबित करने वाले सबूतों के बावजूद, पहली नज़र में (Prima Facie) मामला अभी भी क्यों बनता है।" यह मामला एक शिकायत से शुरू हुआ, जिसमें याचिकाकर्ता और कुछ कस्टम अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और दुराचार का आरोप लगाया गया। शिकायत के आधार पर लोकपाल ने CBI से शुरुआती जांच का आदेश दिया। जांच के बाद एजेंसी को याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला और उसने एक रिपोर्ट सौंपी जिसमें उसे बेकसूर बताया गया।
Director General of Vigilance (DGoV) ने भी इन नतीजों से सहमति जताई, जिन्हें वित्त मंत्रालय में सक्षम अधिकारी ने भी स्वीकार कर लिया था। इसके बावजूद, लोकपाल ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और बाद में याचिकाकर्ता के खिलाफ CBI से पूरी जांच कराने का निर्देश दिया। हाईकोर्ट ने इस तरीके को कानूनी रूप से गलत पाया और कहा, "बिना किसी चर्चा के, जिसके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, उस व्यक्ति की भूमिका पर विचार किए बिना मशीनी तरीके से नोटिस जारी करना कानूनी व्यवस्था की विश्वसनीयता को ही कमज़ोर करता है।"
बेंच ने कहा कि लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम की धारा 20 के तहत कानूनी ढांचा एक "व्यवस्थित" प्रक्रिया को अनिवार्य बनाता है—शुरुआती जांच, सक्षम अधिकारी की टिप्पणियों पर विचार, और आगे की जांच का आदेश देने से पहले, कारणों के साथ पहली नज़र में संतुष्टि बनाना। कोर्ट ने कहा, "यह सिर्फ प्रक्रियागत औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक अनिवार्य ज़रूरत है। लोकपाल को यह दिखाना होगा कि यह संतुष्टि किसी सबूत पर आधारित है और उसने पूरी तरह से सोच-समझकर यह फैसला लिया है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि आगे की कार्रवाई सिर्फ आरोपों या अंदाज़ों के आधार पर न की जाए।
यह देखते हुए कि न तो कारण बताओ नोटिस में और न ही विवादित आदेश में याचिकाकर्ता की भूमिका या उसके खिलाफ किसी भी सामग्री पर कोई चर्चा की गई, अदालत ने DRI अधिकारी के खिलाफ जांच का निर्देश देने वाले लोकपाल का आदेश रद्द कर दिया। समाप्त करने से पहले अदालत ने कहा, “सिर्फ इसलिए कि लोकपाल को धारा 20(3) के तहत जांच करने की शक्ति प्राप्त है, इसका मतलब यह नहीं है कि इस शक्ति का प्रयोग मनमाने या स्वेच्छाचारी तरीके से किया जा सकता है। शक्ति के ऐसे प्रयोग के समर्थन में आदेश में पर्याप्त सामग्री मौजूद होनी चाहिए, जिस पर विधिवत विचार किया गया हो। ऐसी सामग्री के अभाव में यह आदेश मनमाना और अवैध हो जाता है।”

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