डायमंड हार्बर (दक्षिण 24 परगना)। पश्चिम बंगाल की सियासत इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि साख और प्रभाव का बन चुका है। अभिषेक बनर्जी के मजबूत संगठन और जमीनी पकड़ के सामने अमित शाह की रणनीति की सीधी टक्कर दिखाई दे रही है।
दक्षिण 24 परगना को बंगाल की राजनीति का सबसे अहम इलाका माना जाता है। यहां ममता बनर्जी का प्रभाव और अभिषेक बनर्जी की पकड़ इतनी मजबूत है कि इस किले को भेदे बिना सत्ता तक पहुंचना बेहद मुश्किल माना जाता है। यही वजह है कि भाजपा नेतृत्व ने इस जिले को अपनी रणनीति का केंद्र बना लिया है।
भाजपा की योजना साफ है—अगर राज्य में सरकार बनानी है, तो इस जिले की 31 सीटों में कम से कम दहाई तक पहुंचना जरूरी है। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए अमित शाह ने खुद यहां की कमान संभाली है और संगठन को मजबूत करने पर जोर दिया है। साथ ही बिप्लब देब को भी यहां सक्रिय किया गया है, ताकि जमीनी स्तर पर पकड़ बनाई जा सके।
दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी ने इस इलाके को अपनी राजनीतिक प्रयोगशाला बना रखा है। जादवपुर, मथुरापुर और जयनगर जैसे क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं का असर सीधे लोगों तक पहुंचा है। बूथ स्तर तक सक्रिय संगठन उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है। यही वजह है कि उन्होंने खुलकर चुनौती देते हुए कहा है कि चुनाव के बाद विरोधियों को यहां टिकने नहीं दिया जाएगा।
इस इलाके में मुस्लिम मतदाता 20 से 30 प्रतिशत तक हैं, जो तृणमूल के लिए मजबूत आधार माने जाते हैं। हाल ही में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर भी दोनों पक्षों में तनाव देखने को मिला, लेकिन तृणमूल ने अपने संगठन के दम पर स्थिति को संभाल लिया।
पिछले चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि 31 में से 30 सीटों पर तृणमूल का कब्जा रहा, जबकि एक सीट पर अन्य दल को सफलता मिली। हालांकि भाजपा कई सीटों पर मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी बनकर उभरी थी और कुछ जगहों पर उसका मत प्रतिशत 30 से 35 फीसदी तक पहुंचा था।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि असली परीक्षा अब भाजपा और अमित शाह की रणनीति की है। उत्तर बंगाल या अन्य इलाकों में बेहतर प्रदर्शन करना अलग बात है, लेकिन अभिषेक बनर्जी के गढ़ में सेंध लगाना कहीं ज्यादा मुश्किल चुनौती है।
अगर भाजपा यहां दहाई के करीब पहुंचती है, तो बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है। लेकिन अगर अभिषेक बनर्जी का किला कायम रहता है, तो सत्ता की चाबी फिर तृणमूल के पास ही बनी रहेगी। साफ है, यह मुकाबला अब सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा और राजनीतिक वर्चस्व का बन चुका है।

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