नई दिल्ली। केंद्र सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से महिला आरक्षण लागू करने की तैयारी में जुट गई है। इसके साथ ही लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और परिसीमन जैसे बड़े बदलावों का प्रस्ताव भी सामने आया है, जिस पर अब सियासी विवाद तेज हो गया है।
सरकार के प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा की कुल सीटें मौजूदा 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 तक की जा सकती हैं। इनमें 815 सीटें राज्यों के लिए और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए होंगी। इन सीटों में से 33 प्रतिशत यानी करीब 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना है। यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू किया जाएगा, यानी 2029, 2034 और 2039 के आम चुनाव तक प्रभावी रहेगा। हर चुनाव में आरक्षित सीटों में बदलाव भी किया जाएगा और इसमें अनुसूचित जाति एवं जनजाति की महिलाओं को भी शामिल किया जाएगा।
इस पूरे बदलाव का सबसे अहम हिस्सा परिसीमन है। सरकार 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नई सीटों का निर्धारण करना चाहती है, जबकि अब तक 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें तय होती रही हैं। इसके लिए एक परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश करेंगे। आयोग का फैसला अंतिम माना जाएगा और इसे अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकेगी। इस प्रक्रिया का असर न केवल लोकसभा बल्कि राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों पर भी पड़ेगा।
प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने कई सवाल उठाए हैं। Mallikarjun Kharge ने कहा कि कांग्रेस महिला आरक्षण का समर्थन करती है, लेकिन इसे परिसीमन और सीट बढ़ोतरी से जोड़ना उचित नहीं है। Revanth Reddy ने आशंका जताई कि इससे दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है। वहीं Kapil Sibal और Shashi Tharoor ने परिसीमन के मुद्दे पर व्यापक चर्चा की मांग की है।
सरकार की ओर से Kiren Rijiju ने कहा कि महिला आरक्षण को लेकर अब और देरी नहीं होनी चाहिए। वहीं Eknath Shinde ने इसे जल्द लागू करने की वकालत की है।
संविधान संशोधन के इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होगी। मौजूदा आंकड़ों के अनुसार लोकसभा में लगभग 360 सांसदों का समर्थन जरूरी है, जबकि एनडीए के पास 292 और विपक्षी दलों के पास 233 सांसद हैं। ऐसे में सरकार को अन्य दलों का समर्थन जुटाना होगा।
सीटों में संभावित बढ़ोतरी के बाद उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे बड़े राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में बड़ा इजाफा हो सकता है। इससे राजनीतिक संतुलन में बदलाव की संभावना है, जो इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना रहा है।

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