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जनगणना 2026: जातीय आंकड़ों से बदलेगा सत्ता का समीकरणCensus 2026: Caste Data Will Reshape the Power Equation


प्रणव बजाज

संम्पादकीय

“जाति न पूछो साधु की…”—यह आदर्श भले ही समाज को दिशा देता हो, लेकिन आज की राजनीति में जाति और संख्या ही सबसे बड़ा सच बन चुकी है। आने वाली जनगणना अब केवल गिनती नहीं, बल्कि सत्ता और संसाधनों के बंटवारे का आधार बनने जा रही है।


आखिरी बार 1931 में जातियों की विस्तृत गणना हुई थी, और आज भी कई नीतियां उसी पुराने डेटा पर आधारित हैं। 1979 के मंडल आयोग और समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया के “जिसकी जितनी संख्या, उसकी उतनी भागीदारी” सिद्धांत ने इस राजनीति को मजबूती दी।

हाल में बिहार के जातीय सर्वे के बाद यह बहस और तेज हुई है, और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में भी यह मुद्दा राजनीतिक रणनीति का केंद्र बन रहा है।

सबसे बड़ा सवाल आरक्षण की सीमा पर खड़ा होगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 50% सीमा को बढ़ाने की मांग नए आंकड़ों के बाद तेज हो सकती है।

हालांकि जातिगत जनगणना आसान नहीं है—जातियों की सही पहचान और डेटा का दुरुपयोग बड़ी चुनौती है।

स्पष्ट है, यह जनगणना केवल आंकड़े नहीं लाएगी, बल्कि देश की राजनीति और सामाजिक संतुलन को नई दिशा दे सकती है। अब देखना है—यह बदलाव समानता लाएगा या नए विभाजन पैदा करेगा।

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