ग्वालियर। राष्ट्रीय पंचायतीराज दिवस के मौके पर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री वृंदावन ग्राम योजना चर्चा में है, लेकिन इसके क्रियान्वयन से पहले ही प्रशासनिक स्तर पर असमंजस की स्थिति बन गई है। जहां इस योजना के लिए कुल 100 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है, वहीं प्रदेश की 213 विधानसभा क्षेत्रों से शासन के पास पहुंचे प्रस्तावों की कुल लागत अरबों रुपये तक पहुंच गई है, जिससे योजना की मूल अवधारणा और बजट के बीच बड़ा अंतर सामने आ गया है।
इस योजना की घोषणा मुख्यमंत्री मोहन यादव ने पिछले वर्ष की थी। इसका उद्देश्य हर जिले में एक ऐसा आदर्श गांव विकसित करना है, जो आत्मनिर्भरता का मॉडल बन सके। योजना के तहत ऐसे गांवों का चयन किया जाना है, जिनकी जनसंख्या कम से कम दो हजार हो और गोवंश की संख्या न्यूनतम 500 हो। इन गांवों में गो-पालन, डेयरी विकास, जैविक खेती, जल संरक्षण, सौर ऊर्जा, पर्यावरण संरक्षण और स्वरोजगार जैसे क्षेत्रों में समग्र विकास की परिकल्पना की गई है।
निर्धारित बजट के मुकाबले जिलों से आए प्रस्ताव कई गुना अधिक हैं। ग्वालियर जिले के बेहट, टेकनपुर और सिमरिया टांका गांवों के लिए 20-20 करोड़ रुपये से अधिक के प्रस्ताव भेजे गए हैं, जबकि अन्य जिलों से भी भारी-भरकम बजट की मांग सामने आई है। कुल मिलाकर प्रस्तावों की राशि अरबों रुपये तक पहुंच चुकी है।
जानकारी के अनुसार योजना का उद्देश्य सीमित बजट में मौजूदा संसाधनों के बेहतर उपयोग के जरिए गांवों का विकास करना था, लेकिन जिलों ने प्रस्ताव बनाते समय अधोसंरचना विकास पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। सड़कों, भवनों और अन्य निर्माण कार्यों के लिए बड़ी राशि का प्रावधान किया गया, जिससे बजट असंतुलित हो गया है।
पंचायतीराज विभाग अब इन सभी प्रस्तावों की समीक्षा कर रहा है। विभाग के अधिकारियों के अनुसार प्रस्तावों का परीक्षण किया जा रहा है और आवश्यक संशोधन के बाद ही योजना को आगे बढ़ाया जाएगा। पंचायतीराज विभाग के निदेशक हृदयेश श्रीवास्तव ने बताया कि योजना के लिए 100 करोड़ रुपये का बजट निर्धारित है, लेकिन जिलों से आए प्रस्तावों में अधोसंरचना आधारित मांग अधिक है, इसलिए सभी प्रस्तावों को संतुलित और व्यावहारिक बनाने की प्रक्रिया जारी है।
स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री वृंदावन ग्राम योजना की सफलता अब इस बात पर निर्भर करेगी कि प्रस्तावों को किस तरह बजट के अनुरूप पुनर्गठित किया जाता है। यदि समय रहते संशोधन नहीं हुआ तो योजना के क्रियान्वयन में देरी होना तय है, फिलहाल विभागीय स्तर पर मंथन जारी है और उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही संशोधित प्रस्तावों के साथ योजना को धरातल पर उतारा जाएगा।

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