सम्पादकीय
रामनवमी का पावन पर्व भारतीय जनमानस के लिए केवल एक तिथि नहीं, बल्कि मर्यादा, त्याग और सत्य की विजय का उत्सव है। यह पर्व हमें एक ऐसे आदर्श समाज की स्मृति दिलाता है, जिसे रामराज्य के रूप में युगों-युगों से एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ माना गया है। नवंबर 2025 में अयोध्या में ‘धर्म ध्वजारोहण’ के अवसर पर जो संवाद प्रधानमंत्री मोदी द्वारा राष्ट्र के सम्मुख रखा गया, वह न केवल भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक था, बल्कि विकसित भारत-2047 के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एक सुस्पष्ट नैतिक रोडमैप भी था।
इस विमर्श का सबसे गहरा पक्ष ‘विभीषण गीता’ का वह प्रसंग था, जिसके माध्यम से प्राचीन मानवीय मूल्यों को आधुनिक सुशासन और राष्ट्र-निर्माण से जोड़ा गया। यह संवाद उस गंभीर क्षण पर होता है, जब रावण को अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित एक विशाल रथ पर सवार देखकर विभीषण विचलित हो जाते हैं। इसके उत्तर में जिस ‘धर्मरथ’ का वर्णन किया गया, वह भौतिक संसाधनों पर आंतरिक गुणों और चारित्रिक सुदृढ़ता की श्रेष्ठता का उद्घोष है।
किसी राष्ट्र की उन्नति के लिए साहस और संयम का संतुलन अनिवार्य है। धर्मरथ के दो पहिए ‘शौर्य’ और ‘धैर्य’ इसी संतुलन को दर्शाते हैं। समकालीन संदर्भों में ‘शौर्य’ का अर्थ नीतिगत निर्णय लेने का साहस और चुनौतियों के सामने अडिग रहने की इच्छाशक्ति है। वहीं ‘धैर्य’ का अर्थ है उन सुधारों के दीर्घकालिक परिणामों के प्रति प्रतिबद्धता और वैश्विक संकटों के समय विचलित न होना। विकसित भारत के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्र का रथ इन दो गुणों के संतुलन से चले।
धर्मरथ की ध्वजा ‘सत्य’ और ‘शील’ का प्रतीक है। आधुनिक सुशासन में ‘सत्य’ का अर्थ पारदर्शिता और जवाबदेही है। जब व्यवस्था में भ्रष्टाचार के लिए कोई स्थान नहीं होता और प्रत्येक निर्णय सार्वजनिक हित में लिया जाता है, तब सत्य की ध्वजा ऊंची रहती है। आज ‘शील’ या सदाचार का अर्थ नागरिकों और लोकसेवकों का वह आचरण है, जो मर्यादा के अनुकूल हो। यह आचरण ही किसी देश की छवि को वैश्विक पटल पर स्थापित करता है। बल, विवेक, दम और परहित राष्ट्र की चतुर्मुखी शक्ति है।
धर्मरथ को खींचने वाले ये चार ‘घोड़े’ राष्ट्र की शक्ति और उसके उद्देश्यों को परिभाषित करते हैं। जहां ‘बल’ राष्ट्र की सामर्थ्य और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है, वहीं ‘शक्ति’ संग विवेक का होना अनिवार्य है। आज के युग में विवेक का अर्थ है वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीक का मानवीय कल्याण के लिए उपयोग। प्राकृतिक संसाधनों का सतत उपयोग और पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति जिम्मेदारी ‘दम’ का ही आधुनिक रूप है। ‘परहित’ भी महत्वपूर्ण है। विकास की सार्थकता तभी है, जब वह समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचे। इन चार घोड़ों को नियंत्रित करने वाली लगाम क्षमा, कृपा और समता की रस्सियां हैं। बिना सामाजिक न्याय और समानता के विकास का रथ अनियंत्रित हो सकता है। समावेशी विकास का अर्थ ही यही है कि समाज का हर वर्ग समान रूप से सशक्त बने।
अयोध्या के प्रसंग में ‘कोविदार’ वृक्ष के प्रतीक का उल्लेख महत्वपूर्ण रहा है। प्राचीन काल में कोविदार का चिह्न अयोध्या की सेना और राज्य की पहचान था। यह प्रतीक हमें याद दिलाता है कि जब कोई समाज अपनी जड़ों से कट जाता है, तो उसका वैभव इतिहास में दब जाता है। विकसित भारत का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि एक ऐसा राष्ट्र है जो अपनी भाषाई विविधता, सांस्कृतिक परंपराओं और प्राचीन ज्ञान तंत्र पर गर्व करता हो। मानसिक दासता से मुक्ति और अपनी पहचान की पुनर्स्थापना ही राष्ट्र के आत्मविश्वास को लौटाती है। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा पीढ़ी है। यह युवा शक्ति ही वह सारथी है, जो 2047 के संकल्प को सिद्ध करेगी।
तकनीक, स्टार्टअप्स और नवाचार के माध्यम से आज के युवा भारत को एक वैश्विक ज्ञान महाशक्ति बनाने की दिशा में अग्रसर हैं। युवाओं की ऊर्जा को कर्तव्य बोध के साथ जोड़ना ही ‘धर्मरथ’ को सही दिशा में ले जाने का मार्ग है। 2047 में जब भारत अपनी स्वतंत्रता का शताब्दी वर्ष मनाएगा, वह हमारे लिए केवल एक संख्या ही नहीं, बल्कि एक पड़ाव होगा। विभिन्न शोधों के अनुसार भारत का लक्ष्य 30-35 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था बनने के साथ-साथ गरीबी को न्यूनतम स्तर पर लाने और प्रति व्यक्ति आय को विकसित देशों के समकक्ष पहुंचाने का है। यह लक्ष्य केवल सरकारी नीतियों से संभव नहीं। इसके लिए 140 करोड़ नागरिकों की सामूहिक भागीदारी और ‘धर्मरथ’ के मूल्यों का व्यक्तिगत जीवन में समावेश आवश्यक है।
प्रभु श्रीराम का जीवन सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी यदि पथ ‘धर्म’ (कर्तव्य) का हो, तो विजय निश्चित है। जब प्रत्येक नागरिक अपने कार्य को राष्ट्र के प्रति एक आहुति मानेगा और ‘परहित’ को अपना ध्येय बनाएगा, तभी हम सच्चे अर्थों में रामराज्य की उस परिकल्पना को साकार कर पाएंगे जहां ‘बैर न बिग्रह आस न त्रासा’ (न शत्रुता, न भय और न ही दुख)। यही वह समय है जब हमें अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना है, ताकि 2047 का भारत न केवल समृद्ध हो, बल्कि मानवता के लिए शांति और न्याय का प्रदाता बने।

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