विधानमंडलों में मिस्टर इंडिया.....Mr. India in the Legislatures...
• रवि उपाध्याय
विधानमंडलों की खाली कुर्सियां देख कर 1987 में एक हिंदी साइंस फिक्शन फिल्म आई थी, नाम था 'मिस्टर इंडिया'। इस फिल्म में नायक अनिल कपूर ने मिस्टर इंडिया की भूमिका अदा की है। मिस्टर इंडिया की कलाई पर एक घड़ी नुमा यंत्र बंधा होता है। जिसका बटन दबाने पर इसको पहनने वाला व्यक्ति अदृश्य हो जाते हैं और पुनः बटन दबाने पर फिर से साक्षात् प्रकट हो जाता है । हमारे विधान मंडलों भी एक लंबे समय से यही दृश्य देखने में आ रहा है। यहां भी सदस्य अपनी मर्जी के अनुसार प्रकट होते हैं और अदृश्य हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल विपक्ष के दलों में ही है। यही स्थिति सत्तारूढ़ दल के सदस्यों में भी है। लंच के पहले तो फिर भी सदस्यों की मौजूदगी तो फिर भी सम्मान जनक कही जाती है। परंतु लंच के बाद खाली खाली सीटें सदनों का मुंह चिढ़ाने जैसी लगतीं हैं।
ऐसा लगता है कि हमारे प्रजातंत्र के चुने हुए कर्णधारों को मिस्टर इंडिया वाला वह यंत्र या फॉर्मूला हत्थे लग गया है।जिसका उपयोग वे विधान मंडलों से गायब रहने में धड़ाधड़ कर रहे हैं। उनकी जब मर्जी होती है वह सदन में उदयमान हो जाते हैं और जब मर्जी होती है धड़धड़ा कर निकल जाते हैं। फिर विधान मंडलों की उपस्थिति पंजी सबूत पेश करती है कि वे सदन में मौजूद रहे थे। जहां वे बैठते हैं वहां आना उनके लिए जिम्मेदारी कम एक औपचारिकता भर सी महसूस होती है।
सत्र के दौरान यह माननीय जितनी संख्या में सदन में होते हैं उससे ज्यादा उनकी संख्या कैंटीनों में या लॉबी में मिल जाती है । कैंटीन में या फिर वे दिल्ली दर्शन के लिए निकल पड़ते हैं।कहा यह जाता है कि जिसे सरकारी खजाने से वेतन मिलता है वह पब्लिक सर्वेंट होता है और वह कुछ नियमों और कानूनों से बंधे होते हैं। परंतु कानून बनाने वाले इन नियमों की खिल्ली उड़ाते नज़र आते हैं। कानून बनाने वाले स्वयं भू रूप से इन सब बंधनों और जिम्मेदारियों से मुक्त होते हैं। इन पर संत मलूक दास द्वारा कही यह बात सोलह आने सटीक बैठती है।अजगर करे न चाकरी,पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।बस एक बार का इनवेस्टमेंट फिर प्रॉफिट ही प्रॉफिट ।
सरकारी नौकर को तनख़ाह ऐसे ही नहीं मिल जाती है।सत्रह बंधन, सत्रह बंदिशें, सत्रह मालिक। द्वार द्वार पर बंदगी और दूसरी तरफ न कोई नौकरी न चाकरी,न तबादला, न सस्पेंशन। यदि कुछ है तो वह है हेकड़ी और स्वयं के राजा होने का भाव। देश दुनिया में फ्री फोकट में हवाई जहाज और रेल के ऊंचे दर्जे में यात्रा।लाखों की सेलरी,कमीशन अलग से, ऊपर से जय जयकार।न कोई झंझट न कोई रिस्पांसबिलिटी,और दल बदल के लिए करोड़ों के ऑफर अलग से। इसके बाद भी दूध के धुले के धुले । गंगा की तरह पवित्र। पांच साल के ऐश के बाद जीवन भर मुफ्त पेंशन अलग से। इसे कहते हैं सोने की कलम से किस्मत लिखा होना।
कहां सांसद और विधायक जी कहां सरकारी बाबू। कोई मेल है। समय पर ऑफिस पहुंचने के लिए बायोमेट्रिक। वहां आते अंगूठा, जाते अंगूठा, गज़ब तमाशा अंगूठा का। प्रजातंत्र में आदमी से ज्यादा महत्वपूर्ण अंगूठा हो गया। जब देश अनपढ़ था तब भी अंगूठा इंपार्टेंट था। आज देश में 81 प्रतिशत साक्षरता होने के बाद भी अंगूठा महत्वपूर्ण बना हुआ है। अंगूठा ऑल द बेस्ट का भी संकेत है। तो दूसरी तरफ विधायक या सांसद बनने के बाद अंगूठा, माननीयों द्वारा मतदाताओं को दिखाए जाने वाला तोहफा भी होता है।
वर्तमान स्थिति में गोविंदा की फिल्म गैंबलर का यह गाना याद आता है। जिस के बोल हैं । मेरी मर्जी मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं मेरी मर्जी। जीजा को कहूं साला गोरे को कहूं काला मेरी मर्जी । बेचारी जनता, संविधान और संवैधानिक संस्थाएं इसी मेरी मर्जी का शिकार बनी हुई हैं। विधान मंडलों की खाली खाली कुर्सियां देखकर महान शो मैन राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर के गाना याद आता है। गाने के बोल हैं खाली खाली कुर्सी है खाली खाली तम्बू है। खाली खाली घेरा है बिना चिड़िया का बसेरा है। यह गाना फिल्म में दिखाए गए सर्कस में जोकर बने राजकपूर ने गाया है।
काश इसी तरह का गाना कभी संसद या किसी विधानसभा के सदन में फिल्माया जाए। इन सदनों में जो होता है वो किसी सर्कस से कम है कै। वही टेबल पर चढ़ कर नाच गाना, नारेबाजी, गाली गलोच। स्पीकर की अवहेलना। इससे अच्छा दृश्य तो किसी भी क्लास रूम में देखा जा सकता है। जहां टीचर के साइलेंस बोलने पर सुई पटक सन्नाटा छा जाता है। दूसरी तरफ़ ये लोकतंत्र के मंदिर हैं जहां संविधान भी पटक तो भी कोई फरक नहीं पड़ता।

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