कर्ज में दूवी जनना... ओर ऐशो-आराम में डूबी 'मोहन रारकार !'
देश में विकास की गाथा लिखने का दौर चल रहा है। हर तरफ “इन्वेस्टर मीट” का शोर है, जैसे यही वो जादुई मंत्र हो जो रातों-रात प्रदेश को स्वर्ग बना देगा। हमारे माननीय मोहन जी भी इस मंत्र के सबसे बड़े साधक बन चुके हैं। महीने की शुरुआत होते ही उनका कार्यक्रम तय हो जाता है एक नई विदेश यात्रा, एक नई इन्वेस्टर मीट, और एक नया वादा।
उनकी यात्राओं को देखकर ऐसा लगता है जैसे वे किसी वैश्विक तीर्थयात्रा पर निकले हों, जहां हर देश में जाकर निवेश रूपी प्रसाद मांगना उनका धर्म बन चुका है। फर्क बस इतना है कि यह तीर्थयात्रा सरकारी खजाने के सहारे होती है और प्रसाद की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्कान और फोटो ही वापस आती है।
जनता बड़ी उम्मीदों के साथ हर बार टीवी पर खबरें देखती है “इतने हजार करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए”, “इतने एमओयू साइन हुए” लेकिन जब जमीन पर कुछ ढूंढने निकलती है तो उसे सिर्फ बोर्ड, पोस्टर और अधूरे वादे ही नजर आते हैं। ये एमओयू अब जनता के लिए किसी पुराने प्रेम पत्र की तरह हो गए हैं जिन्हें पढ़कर भावनाएं तो जागती हैं, लेकिन हकीकत में उनका कोई ठोस अस्तित्व नहीं होता।
सबसे दिलचस्प बात ये है कि इन यात्राओं का खर्च किसके कंधों पर आता है जनता के। सरकार कर्ज लेती है, योजनाएं बनाती है, और फिर उन्हीं पैसों से विदेशों में निवेशकों को लुभाने निकल पड़ती है। यानी घर में राशन कम है, लेकिन मेहमानों को बुलाने की तैयारी जोरों पर है। अब सवाल ये उठता है कि अगर निवेश इतना ही आ रहा है, तो फिर सरकार का कर्ज क्यों बढ़ रहा है? अगर हर यात्रा सफल है, तो फिर बेरोजगारी क्यों बनी हुई है? अगर हर इन्वेस्टर मीट ऐतिहासिक है, तो फिर विकास सिर्फ भाषणों में ही क्यों दिखता है?
शायद इसका जवाब उन चमचमाते मंचों और पांच सितारा होटलों में छुपा है, जहां इन मीटिंग्स का आयोजन होता है। वहां सब कुछ इतना भव्य होता है कि असली मुद्दे कहीं पीछे छूट जाते हैं। निवेशक आते हैं, हाथ मिलाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और चले जाते हैं। और पीछे रह जाती है एक लंबी प्रेस रिलीज, जिसमें विकास के सपनों की लंबी सूची होती है।
दूसरी तरफ हमारे स्थानीय नेता भी किसी से कम नहीं हैं। उन्होंने विकास का अपना अलग मॉडल तैयार कर लिया है “पहले खुद का विकास”। तिजोरियों में नोटों की गड्डियां ऐसे जमा की जा रही हैं जैसे कोई भविष्य के अकाल की तैयारी कर रहा हो। फर्क बस इतना है कि ये अकाल जनता के लिए है, नेताओं के लिए नहीं।
इन नेताओं की जीवनशैली देखकर लगता है जैसे इन्होंने कुबेर से कोई गुप्त समझौता कर लिया हो। महंगे बंगले, लग्जरी गाड़ियां, और हर वक्त नोटों की बारिश ये सब देखकर आम आदमी सोचता है कि आखिर ये कौन-सी नौकरी है जिसमें इतनी तरक्की है? जो सरकार जनता को आत्मनिर्भर बनने का पाठ पढ़ा रही है, वही खुद कर्ज पर निर्भर होती जा रही है। और जो नेता ईमानदारी की बात करते हैं, वही अपनी तिजोरियों को भरने में सबसे आगे हैं।
इन्वेस्टर मीट अब एक ऐसा उत्सव बन चुका है, जिसमें विकास कम और दिखावा ज्यादा होता है। यह एक ऐसा मंच है जहां हकीकत को सजाकर पेश किया जाता है, ताकि सब कुछ बेहतर दिखे। लेकिन सच्चाई यह है कि विकास सिर्फ आंकड़ों और घोषणाओं से नहीं आता, बल्कि जमीन पर काम करने से आता है।
जरूरत इस बात की है कि सरकार इन यात्राओं और आयोजनों से ज्यादा ध्यान उन नीतियों पर दे, जो वास्तव में निवेश को आकर्षित करें। सिर्फ विदेश जाकर निवेशकों को बुलाने से कुछ नहीं होगा, जब तक यहां का माहौल, व्यवस्था और भरोसा मजबूत नहीं होगा।
जनता अब समझने लगी है कि विकास के नाम पर क्या हो रहा है। वो सवाल पूछ रही है, जवाब मांग रही है। और यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। अगर इन्वेस्टर मीट का झोला खाली ही लौटना है, तो कम से कम कर्ज का बोझ तो मत बढ़ाइए। क्योंकि ये बोझ आखिरकार उसी जनता को उठाना पड़ता है, जो हर बार उम्मीद करते है।और ऐसे ही नेता को जिताते हैं !

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