• रवि उपाध्याय
जब से छेदी बाबू को यह पता चला है कि बात बात पर एक्सक्यूज़ मी और थैक्यू बोलना सभ्यता की निशानी है तो उन्होंने तय किया कि वे अब दुनिया को बता देंगे कि वह भी सभ्य इंसान हैं । दरअसल हुआ यह कि एक बार जब छेदी बाबू मेट्रो रेल में खड़े खड़े यात्रा कर रहे थे तब उनके कानों में एक मधुर आवाज गूंजी एक्सक्यूज़ मी। छेदी बाबू ने आवाज की दिशा में पलट कर देखा तो देखते रह गए। उनके पीछे एक सुंदर सी महिला, जिनके बाल कटे हुए थे और आंखों पर काला चश्मा लगा हुआ था। छेदी बाबू ने जब उन्हें देखा तो उनके दिल में गिटार बज उठी। वे तुरंत संभले और रास्ते से थोड़ा हट कर खड़े हो गए। वो मेडम उनसे रास्ता मांग रहीं थीं ताकि वो मेट्रो से नीचे उतर सकें। जब छेदी बाबू ने उन्हें रास्ता दे दिया तो वह फिर स्वर में मिठास घोल कर बोलीं - थैंक्यू।
थैंक्यू शब्द सुनते ही छेदी बाबू अचकचा कर निर्वाक्य हो गए।जब मेडम प्लेटफार्म पर उतर गईं तब छेदी बाबू के मुखारबिंद से हकलाते हुए धीमे स्वर में निकला थैंक्यू..थैंक्यू । लेकिन तब तक मेट्रो एक झटके के साथ वैसे ही तेजी से आगे बढ़ गई जैसे ई-स्कूटी बिना आवाज किए सटाक से आगे बढ़ जाती है।
अपनी मेट्रो यात्रा के बाद जब छेदी बाबू वापस अपने शहर लौट आए। उनका शहर कोई बड़ा शहर तो नहीं था, हां वह गांव से बड़ा और शहर से काफी छोटा था। उसे बड़ा कस्बा कहा जा सकता है। पर यह उसके प्रति लगाव ही था कि वो वहां के बाशिंदों को शहर ही लगता था। जैसे सब को अपनी पत्नी में कभी माधुरी तो कभी हेमा नजर आने लगती है। यह भ्रम अक्सर रात में उस समय होता है जब एलईडी बल्ब की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती है। जिससे उनके चेहरे पर और ग्लो बढ़ जाता है। खैर शहर से लौटने के बाद छेदी बाबू लंबे समय बाद एक दिन मेरे घर आ धमके।
हैप्पी होली बोल कर हमें बधाई दी। नाश्ते का सम्मान किया और बोले इसक्यूज मी भाई साहब चाय और हो जाती तो मजा आ जाता । हमने कहा चिंता मत कीजिए पीछे - पीछे वह भी आ रही है। पर मैंने नोटिस किया कि जिस व्यक्ति ने कभी धन्यवाद नहीं बोला, उसने इसक्यूज मी, कैसे बोल दिया। ये मौसम परिवर्तन कैसे हो गया। यह शब्द तो गाली गलोच करने के बाद भी हमारे सांसद- विधायक और नेता कभी नहीं बोलते, वह अदना से छेदी बाबू ने कैसे बोल दिए। यह तो ग़ज़ब ही हो गया। छेदी बाबू में यह समझ और सभ्यता आखिर आई कहां से ?
भाई साहब के सामने टीवी डिबेट और विधायिकाओं के सदनों के वे दृश्य घूम गए। जिन दृश्यों में बहस के दौरान नेता गण एक दूसरे के खिलाफ नितांत अभद्र और आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग करते नज़र आते हैं। जब उनसे माफ़ी मांगने के लिए कहा जाता है तो वे बेशर्मी से इंकार कर देते हैं। यदि ऐसा करना मजबूरी ही हो जाए तो बड़ा एहसान जता कर कहते हैं कि उनके कथन से यदि किसी को दुःख पहुंचा है तो मैं खेद व्यक्त करता हूं। ऐसा नेताओं को क्षमा मांगने से इंकार करना उनकी सभ्यता की श्रेणी में आता है। ऐसे नेताओं का क्षमा मांगने का अपना ही स्टैंडर्ड होता है। वे केवल कोर्ट में माफ़ी मांगते हैं। वरना हीलिंग चिलिंग फूंक फांक सब मेरे स्टाईल में अड़े रहते हैं।
तब तक चाय भी आ चुकीं थी। छेदी बाबू ने एक जोरदार सुडूक की आवाज लगाने के बाद मेट्रो ट्रेन का वाक्या सुनाते हुए पूछा कि भाई साहब यह बताईए कि कुछ लोग बात बात पर इसक्यूज मी और थैक्यू क्यों कहते हैं। हमने समझाया छेदी बाबू यह सभ्य और एजुकेटेड होने की निशानी है। ओह ये बात है... भाई साहब अब से हमने यह फैसला किया है कि जो काम अब तक हमारे देश के नेता नहीं कर पाए वह काम अब हम दुनिया को करके दिखाएंगे। अब हम भी सभ्य बनेंगे।
छेदी बाबू ने थोड़ी देर सोच कर फिर से सवाल पूछा पर भाई साहब ये नेता लोग संसद और विधानसभाओं में क्यों नहीं सभ्यता से पेश आते ? क्यों अभद्र और असंसदीय शब्दों का उपयोग करने के बाद भी माफ़ी नहीं मांगते ? हमने कहा संस्कार की वजह से।इस तरह के नेताओं को न तो उनके परिवार से इस तरह के संस्कार मिले और न ही पार्टी से। पार्टी में शायद इनके नेता इनसे इसी भाषा में बात करते होंगे तो वह दूसरों से भी उसी भाषा में बात करते हैं। कल इनकी संतान भी इनसे इसी भाषा में बात करेंगे। इसे टिड फॉर टेड कहते हैं।
छेदी बाबू बोले भाई साहब पर मजा तो हमारी प्रेम से पगी खड़ी भाषा में ही है। यदि बीच रास्ते में खड़े व्यक्ति को हटाना हो तो जो मज़ा यह कहने में है कि ओए बीच में क्यों ठाड़ा है, परे हट कर खड़ा हो जा। इस पर जो जवाब मिलता है वह भी मजेदार होता है, ओए ताऊ इत्ती तो जगे पड़ी है, थोड़ा टेड़ा होके निकलजा। सिर पै पैर धरकै जागा कै।
भाई साहब को अपना बचपन याद आ गया जब स्कूल में मैडम ने सिखाया कि घर पर भी मम्मी-पापा से थैंक्यू और एक्सक्यूज़ मी कहा करो और कोई गलती हो जाए तो सॉरी बोला करो। पर हुआ इसका उलटा। पापा मम्मी ने सॉरी एक्सक्यूज़ मी और थैंक्यू कहने पर हड़का दिया। कहा बेटा यह शब्द तुम स्कूल में मैडम से ही बोला करो।यह शब्द पराए और अनजान लोगों से बोले जाते हैं, अपनो से नहीं । पढ़- लिखने का मतलब यह नहीं है कि अपना कल्चर भूल जाएं। अपने कल्चर में बड़ों के चरण स्पर्श किए जाते हैं और सम वयस्कों और छोटों से प्रेम किया जाता है।
इसी बीच छेदी बाबू ने भाईसाहब की तंद्रा तोड़ते हुए कहा इसक्यूज मी, भाई साहब, अब हम चलेंगे। चाय और नाश्ते के लिए थैंक्यू।
( लेखक व्यंग्यकार एवं राजनैतिक समीक्षक भी हैं। )
23032026

Post a Comment