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गेहूं खरीदी में देरी और अव्यवस्था पर किसानों का आक्रोश, सरकार पर गंभीर लापरवाही के आरोपFarmers Outraged Over Delays and Chaos in Wheat Procurement; Government Accused of Gross Negligence

 

क्या यही किसान सम्मान है, क्या यही कृषि नीति है

इंदौर। मध्यप्रदेश में रबी विपणन वर्ष 2026-27 के अंतर्गत गेहूं खरीदी को लेकर सरकार की असंगत और अव्यवस्थित नीतियों ने किसानों को गहरे संकट में डाल दिया है। बार-बार खरीदी तिथियों में बदलाव कर शासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न तो कोई ठोस योजना है और न ही किसानों के हितों के प्रति कोई गंभीरता।



प्रारंभ में गेहूं खरीदी की तिथि 15 मार्च घोषित की गई, फिर इसे 1 अप्रैल तक बढ़ाया गया और अब पुनः 10 अप्रैल 2026 कर दिया गया है। वहीं कुछ संभागों में 15 अप्रैल से खरीदी शुरू करने का निर्णय लिया गया है। यह लगातार बदलाव किसानों के साथ सीधा अन्याय है और उनकी मेहनत पर कुठाराघात है।

संयुक्त किसान मोर्चा ने इस निर्णय को किसान विरोधी बताते हुए कड़े शब्दों में निंदा की है। मोर्चा के नेताओं—बबलू जाधव, रामस्वरूप मंत्री, चंदनसिंह बड़वाया, शैलेंद्र पटेल एवं प्रवीण ठाकुरने कहा कि जब सरकार के पास खरीदी की कोई ठोस तैयारी ही नहीं थी, तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) का ढोल पीटकर किसानों को भ्रमित क्यों किया गया?

किसानों की स्थिति और अधिक दयनीय तब हो जाती है जब उन्हें अपनी उपज को समर्थन मूल्य से कम दाम पर मंडियों में बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि किसानों के साथ खुला अन्याय है।

इसके अतिरिक्त, सोसायटियों में ऋण चुकाने की अंतिम तिथि 28 मार्च निर्धारित की गई थी, जिसे वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनज़र अब तक नहीं बढ़ाया गया है। संयुक्त किसान मोर्चा ने मांग की है कि इस तिथि को तत्काल बढ़ाकर 30 मई 2026 किया जाए, ताकि किसान बिना किसी मानसिक और आर्थिक दबाव के अपनी उपज का उचित प्रबंधन कर सकें।

मोर्चा ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही गेहूं खरीदी व्यवस्था को सुचारू नहीं किया गया, समर्थन मूल्य पर सख्ती से खरीदी सुनिश्चित नहीं की गई तथा किसानों को राहत देने के लिए ऋण भुगतान की तिथि नहीं बढ़ाई गई, तो किसान व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।

“यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि किसानों के अधिकारों का हनन है। सरकार को जवाब देना होगा।

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