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ग़ज़ब घंटा बजा रहा है ‘घंटा मंत्री’ का नगरीय प्रशासन विभाग ?Amazing, is the Urban Administration Department of the 'Ghanta Minister' ringing the bell?

 


राजेन्द्र ...मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों अजीब-अजीब इंजीनियरिंग चमत्कारों के लिए चर्चा में है। कहीं पुल बनते-बनते टेढ़े हो जा रहे हैं, कहीं सड़कें धँसकर धरती में समा रही हैं, और कहीं “स्मार्ट सिटी” का स्मार्टपन ही खोजने से नहीं मिल रहा। हालत यह है कि जनता पूछ रही है कि यह विकास हो रहा है या प्रयोगशाला में चल रहा कोई असफल प्रयोग।



सबसे चर्चित उदाहरण वह 90 डिग्री का पुल है, जिसे देखकर आम आदमी को लगता है जैसे किसी बच्चे ने कॉपी में ज्यामिति का सवाल हल करते-करते पुल बना दिया हो।

सड़कें भी ऐसी बन रही हैं कि लगता है जैसे इंजीनियरिंग कम और जुगाड़ ज़्यादा काम कर रहा हो। स्मार्ट सिटी के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन नतीजा ऐसा कि लोग कहने लगे हैं कि यह “स्मार्ट सिटी” नहीं बल्कि “स्मार्ट कहानी” बनकर रह गई है।

दरअसल असली कहानी इंजीनियरिंग से ज्यादा व्यवस्था की है। कहा जाता है कि किसी भी निर्माण कार्य की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि जिम्मेदारी किसके हाथ में है। लेकिन जब जिम्मेदारी ही उल्टी दिशा में दी जाए तो नतीजा भी उल्टा ही निकलता है। नगरीय प्रशासन विभाग में इन दिनों ऐसा ही एक अनोखा प्रयोग चल रहा है।

बताया जा रहा है कि विभाग में पदस्थ एक इलेक्ट्रिकल इंजीनियर से सिविल निर्माण का काम लिया जा रहा है। अब इलेक्ट्रिकल इंजीनियर का काम बिजली की लाइन, ट्रांसफार्मर और वायरिंग देखना होता है, लेकिन यहाँ उनसे पुल, सड़क और भवन निर्माण की जिम्मेदारी भी निभाने की उम्मीद की जा रही है। नतीजा यह है कि योजनाएँ कागज पर तो सीधी दिखती हैं, लेकिन जमीन पर आते-आते टेढ़ी हो जाती हैं।

किसी भी इंजीनियरिंग शाखा का अपना अलग ज्ञान और अनुभव होता है। सिविल इंजीनियर वर्षों तक संरचना, मिट्टी, भार और डिजाइन के सिद्धांतों को समझते हैं। वहीं इलेक्ट्रिकल इंजीनियर बिजली के नेटवर्क और सिस्टम के विशेषज्ञ होते हैं। लेकिन जब इन दोनों के काम को आपस में मिला दिया जाए तो परिणाम वही होता है जो आज भोपाल और प्रदेश के कई शहरों में दिखाई दे रहा है।

लोग मज़ाक में कह रहे हैं कि अब निर्माण कार्य भी “एल्बो” लगाकर ही होगा। जैसे पाइप लाइन में मोड़ देने के लिए एल्बो लगाया जाता है, वैसे ही सड़क और पुल भी एल्बो की तरह मुड़ते नजर आएंगे। फिर जब कोई पूछेगा कि सड़क 120 डिग्री क्यों घूम गई, तो जवाब मिलेगा कि शायद डिजाइन में ही कोई “स्मार्ट एंगल” था।

असल समस्या यह है कि स्मार्ट सिटी जैसे बड़े प्रोजेक्ट को लेकर जो उम्मीदें थीं, वे धीरे-धीरे धुंधली पड़ती जा रही हैं। जनता को लगा था कि शहर की सड़कें बेहतर होंगी, यातायात आसान होगा, और बुनियादी ढांचा मजबूत बनेगा। लेकिन कई जगहों पर हालात इसके उलट दिखाई देते हैं।

जब पुल बनने से पहले ही चर्चा में आ जाए और सड़क बनते ही धँसने लगे, तो स्वाभाविक है कि सवाल उठेंगे। लोग पूछेंगे कि आखिर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद गुणवत्ता क्यों नहीं दिख रही। जिम्मेदार कौन है और जवाबदेही किसकी तय होगी।

सरकार अक्सर कहती है कि विकास कार्य तेज गति से चल रहे हैं। लेकिन जनता कहती है कि गति के साथ गुणवत्ता भी जरूरी है। अगर जल्दी-जल्दी काम करने के चक्कर में इंजीनियरिंग के मूल सिद्धांतों को ही दरकिनार कर दिया जाए, तो विकास की जगह दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है।

इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि अधिकारी और विभाग अक्सर एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आते हैं। कोई कहता है कि डिजाइन में गलती थी, कोई ठेकेदार को दोष देता है, और कोई मौसम को जिम्मेदार बता देता है। लेकिन असली सवाल वही रह जाता है कि आखिर सिस्टम में ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई।

जनता अब तंज कसते हुए कह रही है कि अगर इसी तरह प्रयोग चलते रहे तो आने वाले समय में शायद डॉक्टर से पुल बनवाए जाएंगे और इंजीनियर से ऑपरेशन करवाया जाएगा। तब सरकार को फिर समझाना पड़ेगा कि गलती कहाँ हुई।

मध्यप्रदेश के शहरों को बेहतर बनाने के लिए जरूरी है कि योजनाओं में पारदर्शिता हो, जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हो और तकनीकी काम तकनीकी विशेषज्ञों से ही कराया जाए। वरना “स्मार्ट सिटी” का सपना कागजों और भाषणों तक ही सीमित रह जाएगा।

अभी तो हालात ऐसे हैं कि लोग विकास के नाम पर बन रहे इन अजीब नमूनों को देखकर बस यही कह रहे हैं “साहब, विकास कम और इंजीनियरिंग का मज़ाक ज़्यादा लग रहा है।”

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