इंदौर। देशभर में ट्रांसजेंडर समुदाय के सामने पहचान को लेकर गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है। समाज और परिवारों द्वारा स्वीकार्यता की कमी के बीच, केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तुत ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। इस विधेयक में अधिकारों और पहचान के लिए कठोर नियम निर्धारित किए गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप देशभर में चार लाख से अधिक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की पहचान को लेकर संकट उत्पन्न हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट के 'नालसा' फैसले के उल्लंघन का आरोप
ट्रांसजेंडर संगठन की पदाधिकारी संध्या घावरी ने एक पत्रकार वार्ता में इस मुद्दे पर प्रकाश डाला। सोमवार को प्रेस क्लब में ट्रांसजेंडर और क्वीयर समुदाय ने ‘ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक, 2026’ के खिलाफ प्रदर्शन की योजना की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह संशोधन नालसा बनाम भारत संघ (2014) के ऐतिहासिक फैसले के खिलाफ है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने हर व्यक्ति को अपनी लैंगिक पहचान स्वयं निर्धारित करने का अधिकार दिया था।
परिभाषा और निजता के अधिकार पर गहराता संकट
समुदाय की प्रमुख चिंता यह है कि नया विधेयक ‘ट्रांसजेंडर’ की परिभाषा को संकीर्ण करता है, जिसमें ट्रांसमैन, ट्रांसवुमैन, नॉन-बाइनरी और जेंडर-क्वीयर की पहचान को नजरअंदाज किया गया है। इसके अलावा, यह विधेयक ट्रांसजेंडर पहचान को शारीरिक बदलाव का परिणाम बताता है, जिससे उनकी वास्तविक पहचान को ठेस पहुंचती है। संगठन के पदाधिकारी निकुंज जैन ने विधेयक में प्रशासनिक और मेडिकल संस्थाओं को अधिक अधिकार देने की बात भी उठाई है, जिससे निजता और स्वतंत्रता के अधिकार पर खतरा बढ़ सकता है।

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