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रायपुर में अविभाजित मध्य प्रदेश के दौरान हुए बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश, 30 साल बाद बेनकाब हुआ करोड़ों का आवास ऋण घोटालाMajor Fraud from the Era of Undivided Madhya Pradesh Exposed in Raipur: Multi-Crore Housing Loan Scam Uncovered After 30 Years

 

राजधानी रायपुर में अविभाजित मध्य प्रदेश के दौरान हुए एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश हुआ है, जिसने सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचाया।

आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) की कार्रवाई में आधुनिक गृह निर्माण सहकारी समिति के अध्यक्ष थावर दास माधवानी और तत्कालीन आवास पर्यवेक्षक बसंत साहू की 26 वर्षों बाद पिछले दिनों हुई गिरफ्तारी के बाद इस घोटाले की गहरी साजिश का राजफाश हुआ है। 


186 लोगों के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए

मुख्य आरोपित थावर दास ने अपने परिचितों और रिश्तेदारों को मोहरा बनाकर 186 लोगों के नाम पर फर्जी दस्तावेज तैयार किए और मध्य प्रदेश सहकारी आवास संघ से प्रति व्यक्ति एक लाख रुपये के हिसाब से कुल 1.86 करोड़ रुपये का लोन स्वीकृत कराया।

अन्य शहरों में निवासरत पीड़ितों के बयान दर्ज किए

जब इस मामले की शिकायत और जांच शुरू हुई, तब यह फर्जीवाड़ा उजागर हुआ। ईओडब्ल्यू की टीम ने दोनों आरोपितों को 25 मार्च तक रिमांड पर लेकर पूछताछ की और रायपुर, भाटापारा सहित अन्य शहरों में निवासरत पीड़ितों के बयान दर्ज किए।

वास्तविकता में समिति के पास एक इंच भी जमीन नहीं थी

थावर दास ने पंडरी में अपनी कपड़ा दुकान के माध्यम से रायपुरा, बोरियाकला, राखी और पंडरी-कांपा जैसे क्षेत्रों में 80 एकड़ जमीन होने का दावा किया, लेकिन ईओडब्ल्यू की जांच में यह सामने आया कि वास्तविकता में समिति के पास एक इंच भी जमीन नहीं थी।

कागजों पर मकानों का निर्माण कार्य भी दिखाया जाता रहा

हैरानी की बात यह है कि आवास संघ के तत्कालीन अधिकारियों की मिलीभगत से कागजों पर मकानों का निर्माण कार्य भी दिखाया जाता रहा। दिवंगत क्षेत्रीय अधिकारी एई ग्रेबियल और पर्यवेक्षक बसंत साहू ने बिना किसी भौतिक सत्यापन के आवास निर्माण पूर्ण होने के प्रमाण पत्र भी जारी कर दिए।

वर्षों तक पता नहीं चला कि उनके नाम पर लाखों का कर्ज लिया गया

जब ईओडब्ल्यू की टीम पीड़ितों के घर पहुंची, तो कई लोगों के पैरों तले जमीन खिसक गई। लक्ष्मीचंद चिमनानी, दिलीप बलानी, त्रिजुगी नारायण, मोहनलाल अग्रवाल, नरेंद्र कश्यप, अशोक नाग और लक्ष्मीचंद ललवानी जैसे पीड़ितों ने बताया कि उन्हें वर्षों तक इस बात का पता नहीं चला कि उनके नाम पर लाखों का कर्ज लिया गया है।

थावर दास पर उनका इतना भरोसा था कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि वह उनके नाम का उपयोग कर इतना बड़ा घोटाला कर देगा। जब अधिकारियों ने लोन के कागजात दिखाए, तब उन्हें एहसास हुआ कि वे बिना मकान के ही कर्जदार बना दिए गए हैं।

फर्जी प्रमाण पत्रों का सहारा लिया गया

कई पीड़ितों ने कहा कि उनसे न तो कभी हस्ताक्षर लिए गए और न ही उन्हें समिति का सदस्य बनाने की जानकारी दी गई। यह पूरी तरह से एक संगठित आपराधिक षड्यंत्र था, जिसमें फर्जी प्रमाण पत्रों का सहारा लिया गया। मुख्य आरोपित थावर दास ने अपने करीबी दोस्तों और रिश्तेदारों को इस ठगी का औजार बनाया।

186 जरूरतमंदों के नाम पर कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए

1995 से 1998 के बीच, तत्कालीन मध्य प्रदेश सरकार की शहरी आवास योजना के तहत 186 जरूरतमंदों के नाम पर कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए। इन फर्जी सदस्यों के नाम पर मध्य प्रदेश सहकारी आवास संघ से प्रति व्यक्ति एक लाख रुपये का लोन स्वीकृत कराया गया।

विभागीय अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं

ईओडब्ल्यू के जांच अधिकारियों ने बताया कि इस घोटाले की जड़ें आवास संघ के भीतर तक फैली थीं। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि विभागीय अधिकारियों ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी थीं। उपयोगिता प्रमाण पत्र से लेकर निर्माण के विभिन्न चरणों की रिपोर्ट तक, सब कुछ दफ्तर में बैठकर तैयार किया गया। ईओडब्ल्यू अब इस मामले में अन्य कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।

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