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प्रमोशन के लिए 18 साल कानूनी लड़ाई, हाईकोर्ट का मरणोपरांत फैसला, देना होगा प्रमोशन और सेलरी डिफ्रेंस18-Year Legal Battle for Promotion: High Court Delivers Posthumous Verdict—Promotion and Salary Arrears Must Be Granted.

 

ग्वालियर: कहते हैं न्याय में समय लग सकता है लेकिन मिलता जरूर है और ये बात ग्वालियर हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद साबित होती दिखाई दी. यहां 18 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद एक याचिकाकर्ता को उसके मरणोपरांत उसका हक मिल ही गया. मामला कृषि विभाग के अधिकारी के प्रमोशन का है, जिस पर ग्वालियर हाईकोर्ट ने अब फैसला उनके हक में दिया है. हाईकोर्ट ने सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा कि मृत्यु के बाद भी कर्मचारी के अधिकार खत्म नहीं होते और उनके परिवार को उचित हक मिलना चाहिए


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याचिकाकर्ता की जगह जूनियर को दिया था प्रमोशन

ग्वालियर के रहने वाले राधाकृष्ण शर्मा ने 2008 में ग्वालियर हाईकोर्ट में एक याचिका लगाई थी और बताया था कि, साल 2002 में वे सीनियर एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर थे और उनका प्रमोशन होना था लेकिन जब समय आया तो विभाग ने उनकी पदोन्नति रोक दी और उनकी जगह उनके जूनियर को पदोन्नत कर दिया. जिसके खिलाफ उन्होंने 6 साल बाद कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. राधाकृष्ण शर्मा 2009 में सेवानिवृत्त हो गए थे.

'आपराधिक मामले को आधार बनाकर रोका था प्रमोशन'

याचिकाकर्ता के वकील एडवोकेट आलोक कटारे ने बताया "राधाकृष्ण शर्मा को 18 नवंबर 1978 को वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया था. जब 2002 में नियम अनुसार उनका प्रमोशन होना था तब 01 अप्रैल 2002 को पदोन्नति के लिए बनी लिस्ट में उनका नाम 63वें स्थान पर था लेकिन उनके स्थान पर उनके एक जूनियर को पदोन्नत कर दिया गया और राधाकृष्ण शर्मा की पदोन्नति रोक दी गई. जिसके पीछे वजह बताई गई कि उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है, बाद में 2005 में इस मामले से याचिकाकर्ता को कोर्ट ने निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया लेकिन विभाग द्वारा उन्हें पदोन्नत नहीं किया गया."

निर्दोष साबित होने के बाद भी नहीं मिला प्रमोशन

राधाकृष्ण शर्मा को जब उनका हक नहीं मिला तो उन्होंने अपने वकील के जरिये 2006 में विभाग को बताया कि उनके ऊपर पदोन्नति रोकने के लिए लगाए गए आरोपों को कोर्ट ऑर्डर के आधार पर खारिज बताया गया. अपना हक मांगने पर भी जब विभाग द्वारा उनकी सुनवाई नहीं हुई तो 2008 में उन्होंने हाईकोर्ट का सहारा लिया और मामले में सुनवाई शुरू हुई. लेकिन जनवरी 2026 में याचिकाकर्ता राधाकृष्ण शर्मा का निधन हो गया. जिसके बाद उनके बेटे ने इस याचिका को आगे बढ़ाया और करीब 18 साल तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद ग्वालियर हाईकोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला दे दिया.

हाईकोर्ट ने फैसले के साथ की तीखी टिप्पणी

वकील आलोक कटारे के मुताबिक ग्वालियर हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान मध्य प्रदेश शासन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि "शासन की गलती की वजह से याचिकाकर्ता राधाकृष्ण शर्मा को उनका प्रमोशन नहीं मिल सका, अगर किसी कर्मचारी की पदोन्नति विभागीय गलती से रोकी जाती है, तो उसे पूरा लाभ मिलना चाहिए.

'नो वर्क-नो पे' का सिद्धांत ऐसे मामलों में लागू नहीं होगा. बिना बताए गए एसीआर को पदोन्नति का आधार बनाना कानून के खिलाफ है और यह संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है. ऐसे में याचिकाकर्ता का प्रमोशन 2002 से दिया जाए और उन्हें प्राप्त सभी देयकों का भुगतान उनके परिवार को किया जाए."

कोर्ट ने निर्देश दिया कि राधाकृष्ण शर्मा को 28 अक्टूबर 2002 से पदोन्नत माना जाए और उनके परिवार को एरियर, वेतन और वरिष्ठता का लाभ दिया जाए. मौत के बाद भी कर्मचारी के अधिकार खत्म नहीं होते, और उनके परिवार को उचित हक मिलना चाहिए.

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