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01 अप्रैल: सहकारिता के पितृ पुरुष सुभाष यादव जयंतीApril 1: Birth Anniversary of Subhash Yadav, the Father of the Cooperative Movement

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मिट्टी के सपूत की अमर जयंती: सहकारिता की अनकही क्रांति

 प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

मध्य प्रदेश के खरगोन जिले के बोरावां गांव की धरती 1 अप्रैल 1946 को एक ऐसे योद्धा को जन्म देने गर्व महसूस कर रही थी, जिसकी जड़ें गहरी किसानी में थीं। पिता गंगाराम यादव के कृषक परिवार में पले-बढ़े सुभाष यादव ने बचपन से ही खेतों की मिट्टी को छूते हुए बड़े सपने देखे। उनकी आँखों में हर किसान की पीड़ा झलकती थी और हर खेत उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बनता था। मिट्टी उनके जीवन का पहला शिक्षक थी। कृषि विषय में स्नातक होने के बाद उन्होंने अपने गृह गांव में उन्नत खेती के प्रयोग शुरू किए—बीजों को नई तकनीक से जोड़कर, पानी और मिट्टी के संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए। उस समय गांव की हर कुटिया संघर्ष की कहानियां बयां करती थी, लेकिन सुभाष जी ने कभी हार नहीं मानी। उनकी आंखों में किसान के उज्ज्वल भविष्य का सपना था, जो धीरे-धीरे सहकारिता की राह पर बदलने वाला था। यही वह मजबूत नींव थी, जिस पर बाद में पूरे प्रदेश का कल्याण खड़ा हुआ।


1971 में प्राथमिक सेवा सहकारी समिति बोरावां के सदस्य बनकर सुभाष यादव ने सहकारिता क्षेत्र में प्रवेश किया। हर बैठक में उनकी नजर किसानों के खेतों और घरों की वास्तविक परेशानियों पर टिकी रहती थी। वे केवल निर्णय लेने वाले नहीं, बल्कि किसानों की आवाज को नीति में बदलने वाले नेता थे। मात्र तीन वर्ष बाद, 27 जून 1974 को उन्हें सर्वसम्मति से जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, खरगोन का अध्यक्ष चुना गया। इस पद पर उन्होंने किसानों की आर्थिक स्थिति को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाया। 1980 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने उन्हें मध्य प्रदेश राज्य सहकारी बैंक का अध्यक्ष मनोनीत किया। उन्होंने इस पद पर लगभग 25 वर्षों तक विभिन्न कार्यकालों में सेवा दी, जिसमें 2002 तक तीन प्रमुख कार्यकाल शामिल थे। राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी छाप गहरी रही—1983-86 और 1986-89 में नेशनल फेडरेशन ऑफ स्टेट कोऑपरेटिव बैंक्स, मुंबई के निर्विरोध अध्यक्ष बने। सहकारिता श्री तथा सर्वश्रेष्ठ सहकारिता पुरुष जैसे सम्मानों से सम्मानित वे किसानों की सशक्त आवाज बनकर उभरे।

सहकारिता के इस महान योद्धा ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रौशन किया। उन्होंने अमेरिका, रूस, यूरोप और दक्षिण-पूर्व एशिया की यात्राएँ कीं और हर यात्रा से नई तकनीक सीधे अपने गांव में लागू की। तकनीक उनके लिए केवल प्रगति नहीं, बल्कि किसान के खेत में लाभ और आत्मनिर्भरता थी। खरगोन में सूत मिल और अन्य सहकारी उद्यमों को मजबूत करने में उनका योगदान निर्णायक रहा, जिससे किसानों की आय बढ़ी। इन प्रयासों ने स्थानीय अर्थव्यवस्था सशक्त की और निमाड़ क्षेत्र को आत्मनिर्भरता की मिसाल बनाया। सुभाष यादव ने साबित किया कि सहकारिता केवल आंदोलन नहीं, बल्कि किसान क्रांति का माध्यम है।

1980 और 1985 में खरगोन लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर दो बार सांसद चुने गए सुभाष यादव ने संसद में किसानों की पीड़ा को मुखर किया। उनकी हर बातचीत में मिट्टी की खुशबू और किसान की मेहनत की सराहना झलकती थी, जिससे दिल्ली के गलियारों में भी किसानों की आवाज़ गूंजती रही। 1993 में कसरावद विधानसभा से विधायक बनकर वे मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल में उप मुख्यमंत्री पद तक पहुँचे। दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में 14 दिसंबर 1993 से 30 नवंबर 1998 तक वे उप मुख्यमंत्री रहे। कृषि, सहकारिता, जल संसाधन और नर्मदा घाटी विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालते हुए उन्होंने प्रदेश के किसानों के लिए अभूतपूर्व कार्य किए। हर नीति में गांव की चिंता झलकती थी, हर फैसला सीधे मिट्टी और किसान से जुड़ा होता था।

1998 में पुनः कसरावद से विधायक चुने गए सुभाष यादव ने 2008 तक लगातार तीन कार्यकालों तक विधानसभा सेवा दी। सोनिया गांधी ने उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया, जहां उन्होंने पार्टी को नई दिशा और ऊर्जा दी। मध्य प्रदेश कृषक कल्याण आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शासन को 888 महत्वपूर्ण सुझाव दिए, जो आज भी किसान नीतियों की मजबूती का आधार बने हुए हैं। भारत कृषक समाज की राज्य इकाई के सभापति और अध्यक्ष के रूप में वे लगातार किसानों के हितों की लड़ाई लड़ते रहे। उनकी राजनीति कभी व्यक्तिगत नहीं थी—यह हमेशा सामूहिक कल्याण की राजनीति थी, जहां हर छोटा किसान बड़े सपने देख सके और उन्हें साकार कर सके।

बोरावां में जवाहरलाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी की स्थापना कर सुभाष यादव ने शिक्षा के क्षेत्र में भी नई क्रांति लाई। उनके लिए शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं थी; यह खेत और कक्षा दोनों में बच्चों के भविष्य को संवारने का माध्यम थी। जवाहरलाल नेहरू चैरिटेबल एजुकेशनल ट्रस्ट के माध्यम से संचालित इस संस्थान ने किसानों और मजदूरों के बच्चों को आधुनिक तकनीकी शिक्षा प्रदान की, जिससे सैकड़ों युवा अनुसंधान और रोजगार की राह पर अग्रसर हुए। उनकी पत्नी दमयंती यादव के साथ पाला-पोसा परिवार राजनीति और सेवा का प्रतीक बन गया। दो पुत्र—अरुण सुभाषचंद्र यादव और सचिन सुभाषचंद्र यादव—आज कांग्रेस की मजबूत कड़ी हैं, जबकि चार पुत्रियां परिवार की गरिमा और प्रतिष्ठा बढ़ाती हैं। सुभाष यादव की यह विरासत हर घर में जीवित है और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

धूप में पसीना बहाने वाले किसान की आत्मा आज भी हमारे बीच गूंजती है। 26 जून 2013 को नई दिल्ली ने एक महान व्यक्तित्व खो दिया, लेकिन हर साल 1 अप्रैल उनकी जयंती हमें नई प्रेरणा देती है। सुभाष यादव की स्मृति सिखाती है कि किसान की आवाज़ कभी दब नहीं सकती—यह मिट्टी के साथ सांस लेती है और हर बीज में जीवन पाती है। आज, बोरावां की धरती उनके संघर्ष और साहस की कहानी फिर से गुनगुना रही है—वह किसान जिसने उप मुख्यमंत्री का पद संभाला, और वह नेता जिसने सहकारिता के सिद्धांतों को जीवन बनाया। उनकी जीवन यात्रा सिखाती है कि जब सपनों के बीज को मेहनत की मिट्टी में रोपा जाता है, तो वे विशाल पेड़ों में बदल जाते हैं। हम प्रण लेते हैं कि किसान की आवाज़ कभी दबने नहीं पाएगी। उनकी अमर जयंती हमेशा यह याद दिलाती रहेगी—सच्ची विजय संघर्ष से ही मिलती है।

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