उनका कहना है कि भिया हम क्या करें, नीचें से लिया गया माल ऊपर तक जाता है। यह सिर्फ हमारे पास ही नहीं रहता है। हम तो सिर्फ बीच वाले हैं। हम तो जनता व लोकतंत्र की सेवा कर रहे हैं। यह सब सेवा के नाम पर हो रहा है और सेवा करना क्या गलत है? आपको इससे दिक्कत है तो ऊपर वालों से बात करो। मुझे समझ नहीं आया कि यह ऊपर वाला कौन है ? क्या यह ऊपर वाला वहीं है जिसके नाम से कथावाचक पंडालों में बैठी भोली जनता को डराते है या फिर यह ऊपर वाला वहीं है जिसे किसी ने आजतक नहीं देखा। लेकिन मैंने तो इतना ही सुना था कि असली ऊपर वाला तो सिर्फ देता ही आया है, उसने अब तक कुछ किसी से लिया ही नहीं। किसी की सेवा नहीं लेता। सबको सहयोग ही करता आया है।
फिर मैंने ऊपर वाले के नाम से लेने वाले से पूछा कि यह ऊपर वाला कौन है ? तो टेबल के नीचे से लेने वाला हँसने लगा। कहने लगा, “भिया आप भी मजाक अच्छा करते हो, आप तो हमसे लाख गुना अच्छे से ऊपर वाले को जानते हो। आपने तो ऊपर वाले को ऊपर तक पहुंचाने में चुनाव के समय दिन-रात एक की थी और अब आप उन्हें ही भूल गए! आपको भी उनकी सेवा करना चाहिए!”
मैं उसके इस प्रश्न का जवाब कैसे देता। जब ऊपर वाले मुझे ही भूल गया हो, मेरी सेवा ही भूल गए। तो अब उसे यह कैसे बताऊँ! अपना दुखड़ा कह देता तो जो थोड़ा बहुत रुतबा बचा था, वह भी चला जाता। खैर आजकल नीचे वाले को देने के मामले में नियम व शिष्टाचार हो गया है कि ऊपर वाले के नाम पर अक्सर कुछ न कुछ सेवा शुल्क देना ही पड़ता है। आजकल सभी ऊपर वाले के नाम से लेते तो हैं, लेकिन ऊपर वाला है कि किसी के हाथ तक नहीं आता !
ऊपर वाले के पास सब अपनी अपनी प्रार्थनाएं व मांग सूची पहुंचाना चाहते हैं लेकिन सरकारी कार्यालयों में से ऊपर वाले के पास फाईलें जाती हैं ? और जब तक फाईलों में सेवा वजन नहीं होता, फाईलें ऊपर तक नहीं उड़ सकती हैं। लोकतंत्र के मंदिरों में बैठे ऊपर वाले अलग हिसाब किताब से अपनी दुकानें चलाते हैं। उन्हें नीचे वालों के कर्म से ज्यादा कुछ लेना देना नहीं होता है उन्हें कागजों के साथ जमा माल से लेना देना होता है। इधर के ऊपर वाले इस हिसाब से ही कर्मो का निर्धारण करते हैं। क्योंकि उन्हें भी अपने से ऊपर वालों को कुछ देना होता है। नहीं तो उनसे ऊपर वाले उन्हें नीचे खिसका सकते हैं। ऊपर वाले की लाठी में आवाज नहीं होती। कब नीचे वाले पर चल जाए कोई भरोसा नहीं। “लोकतंत्र की सुंदरता यही है कि इसमें एक से बढ़कर एक ऊपर वाले हैं और हर एक ऊपर वाले से बड़ा एक ओर ऊपर वाले का संवैधानिक प्रावधानों के तहत समय समय पर निर्माण व गठन होता रहता है। ताकि ऊपर वाले ऊपर रहे और नीचे वाले नीचे से सेवा उन्हें देते रहें। और वही नीचे वाले नीचे ही लोकतंत्र की सेवा करते रहें। इसे नीचे रेंगते रहना भी कह सकते हैं।”
हमारे बढ़े बुजुर्ग कह गए हैं कि ऊपर वाला सब देखता है, लेकिन वर्तमान समय में ऊपर वाले माल लेते हैं तब कहीं कृपा होती है। तब कहीं नीचें वालों की ओर देखते हैं। कुछ दया करते हैं। अक्सर कहा जाता है कि ऊपर की कमाई को पाप माना जाता है लेकिन यह पाप आजकल पाप पुण्य का हिसाब करने वाले ही ज्यादा करते है। वो बात अलग है कि वे लोग यह पाप स्वयं नहीं करते है, उसके लिए उन्होंने एक लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाकर रखी है जिसमें सबका काम व दाम बराबर बांटकर रखा है। बड़ी अच्छी उचित मूल्य की सेवा दुकानें खोलकर रखी हैं। जिसमें सब ईमानदारी से ऊपर तक उचित सेवा का मूल्य पहुंचाते हैं। अब ऊपर तक जाने के लिए भी ऊपर वाले को पहले कुछ देना होता है तब कहीं नीचे वाले ऊपर पहुंचाते हैं। इसके लिए बकायदा कंपनियां खुल गई है। हो सकता है ऊपर की कमाई को सुरक्षित रखने के लिए ऊपर वाली नामक बैंके भी जल्द ही खुल जाए। वैसे विदेश में तो ऊपर की कमाई रखने के लिए बैंक है भी ! ऊपर तक जाने वाली इस सेवा का बकायदा विकेन्द्रीकरण होता जा रहा है। गांवों से लेकर शहरों तक यह ऊपर जाने वाली सेवा दिनोंदिन फलफूल रही है।
भूपेन्द्र भारतीय
205, प्रगति नगर,सोनकच्छ,
जिला देवास, मध्यप्रदेश(455118)
मोब. 9926476410

Post a Comment