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अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।” कटघरे में कौन"What's the point of regretting now, when the bird has already eaten the crop?" Who is in the dock??

 


इंदौर। देश के सबसे साफ शहर इंदौर के भागीरथपुरा में गंदे पानी से हुई मौतों ने न सिर्फ प्रशासन, बल्कि भाजपा संगठन के तौर‑तरीकों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस मुद्दे पर संगठन ने बाद में महापौर और पार्षद की क्लास ली, उसी मुद्दे पर अगर शुरुआत में ही संवेदनशीलता दिखाई जाती, तो हालात इतना बिगड़ने ही नहीं दिए जाते।

पहले सुन लेते तो ‘क्लास’ की नौबत न आती

भागीरथपुरा कांड के बाद महापौर पुष्यमित्र भार्गव बार‑बार सार्वजनिक रूप से कह चुके थे कि अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे, मीटिंगों में भी उन्होंने साफ कहा कि निर्देश देने के बावजूद अमला काम नहीं कर रहा।  

यही बात पार्षद कमल वाघेला भी मौतों के बढ़ते आंकड़े और मैदान की सच्चाई बताकर अलग‑अलग मंचों पर उठाते रहे, लेकिन इन चेतावनियों को समय रहते गंभीर राजनीतिक संकेत की तरह नहीं पढ़ा गया, बल्कि बाद में इन्हीं बातों को “सरकार के खिलाफ बयानबाज़ी” का नाम देकर उल्टा उसी महापौर और पार्षद को कटघरे में खड़ा किया जाने लगा।

असल सवाल यह है कि जब जनप्रतिनिधि बार‑बार कह रहे थे “अफसर नहीं सुन रहे”, तभी संगठन क्यों नहीं चेता?  

यदि संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा और प्रदेश नेतृत्व उसी समय सक्रिय होकर अफसरों को कटघरे में खड़ा करते, तो न तो शहर की बदनामी इस स्तर पर होती और न ही जनता को गंदे पानी की कीमत जान देकर चुकानी पड़ती।

गलती कहां हुई: बयानबाज़ी में या अनसुनी में?

अब यह तर्क दिया जा रहा है कि महापौर और पार्षद ने सार्वजनिक मंच से सरकार के खिलाफ बोला, जिससे बदनामी हुई।  

लेकिन बदनामी की असली जड़ यह है कि जिन मुद्दों पर वे पहले से चेतावनी दे रहे थे, उन शिकायतों को “अंदर ही अंदर” सुलझाने की जगह टाल दिया गया, जिसके बाद मामला मौतों और आक्रोश तक पहुंच गया यानी बीमारी को बढ़ने दिया, और फिर मरीज को दोष देने लगे कि उसने दर्द की बात बाहर कैसे बता दी।

अगर संगठन का शीर्ष नेतृत्व समय रहते महापौर और पार्षद की पीड़ा सुन लेता, फील्ड अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई कर देता, तो यही जनप्रतिनिधि आज “दोषी” नहीं, समाधान का चेहरा होते।  

यहां “ऊंट सीधे पहाड़ के नीचे” तब आया, जब खेत लुट चुका था, और अब पूरी ताकत इस बात पर लग रही है कि कौन‑कौन सा बयान पार्टी लाइन से थोड़ा इधर‑उधर चला गया।

हितानंद शर्मा के लिए भी आईना

आज संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा महापौर और पार्षद को यह समझा रहे हैं कि पहले संगठन से बात करनी थी, सार्वजनिक रूप से न बोलें, सरकार की बदनामी होती है।  

पर वही हितानंद शर्मा उस दिन को भी याद करें, जब केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा के आगमन पर एयरपोर्ट पर उन्हें ही प्रवेश को लेकर अफसरों की सख्ती और उपेक्षा झेलनी पड़ी थी – तब भी सवाल यही उठा था कि अगर संगठन के इतने बड़े नेता के साथ अफसर यह व्यवहार कर सकते हैं, तो रोज‑रोज फाइल लेकर जाने वाले स्थानीय जनप्रतिनिधियों की कितनी सुनवाई होती होगी।

ऐसे में यह कहना कि “पहले संगठन को बताते” कहीं न कहीं आधा सच लगता है, क्योंकि संगठन खुद भी अफसरशाही के इस रवैये से अनजान नहीं था।  

जिन अफसरों की मनमानी का स्वाद शीर्ष नेता स्वयं चख चुके हैं, उनके सामने संघर्ष कर रहे महापौर और पार्षद को डांटना, और यह कहना कि “आपने बदनामी करा दी”, नेतृत्व की अपनी जिम्मेदारी से बचने जैसा दिखता है।

मंत्री और शीर्ष नेतृत्व की चूक को भी देखना होगा

भागीरथपुरा की यह त्रासदी किसी एक बयान या एक पार्षद की प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं, बल्कि लम्बे समय से चली आ रही अफसरशाही की ढिलाई, राजनीतिक चुप्पी और समय पर निर्णायक फैसले न लेने की आदत से बनी है।  

नगरीय प्रशासन मंत्री हों या स्थानीय प्रभारी मंत्री, जिस शहर में लगातार शिकायतें उठती रहें, पाइपलाइन और पानी की गुणवत्ता पर चेतावनी दी जाती रहे, वहां “घंटे वाला बयान” देकर या बाद में तलब होकर बस औपचारिक सफाई देना, जनता के घाव पर नमक छिड़कने जैसा महसूस होता है।

जरूरी यह है कि शीर्ष नेतृत्व यह स्वीकार करे कि गलती सिर्फ नीचे बोलने वालों की नहीं, ऊपर न सुनने वालों की भी है।  

संगठन यदि वास्तव में आत्ममंथन करे, तो उसे यह मानना पड़ेगा कि महापौर और पार्षद ने वक्त रहते दर्द बताया, लेकिन “लेट‑लतीफ़ी” संगठन और सरकार, दोनों स्तर पर हुई।

अब सबक क्या लिया जाए?

किसी भी लोकतांत्रिक दल की ताकत उसका कार्यकर्ता और उसका स्थानीय जनप्रतिनिधि होता है, जिसे सिर्फ डांटने के लिए नहीं, साथ खड़े होने के लिए चुना जाता है।  

यदि आगे भी यही मॉडल रहेगा कि पहले शिकायतों को अनसुना किया जाए, अफसरों को खुली छूट दी जाए, और जब संकट फूट पड़े तो सबसे पहले उसी महापौर और पार्षद की गर्दन पकड़ ली जाए, तो यह न संगठन के लिए अच्छा है, न सरकार के लिए और न शहर की जनता के लिए।

जरूरी यह है कि आगे से जब भी कोई महापौर या पार्षद खुले शब्दों में कहे – “अफसर नहीं सुन रहे” – तो उसे पार्टी‑विरोधी बयान की जगह “रेड अलर्ट” माना जाए, और उसी समय अफसरशाही को कठघरे में खड़ा किया जाए।  

वरना हालात वहीं लौट आएंगे, जहां आज खड़े हैं – ऊपर से डाँट, नीचे से पीड़ा, और बीच में पिसती आम जनता – और फिर बार‑बार यही पंक्ति दोहरानी पड़ेगी: “अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत।”

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