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समय का इंतज़ार नहीं, समय का निर्माण ही संघ कार्य की शक्तिThe strength of the Sangh's work lies not in waiting for the right time, but in creating the right time.

 प्रकाशन हेतु

अजय कुमार बियानी

इंजीनियर एवं लेखन

अक्सर हम यह कहते हुए सुने जाते हैं कि “समय मिलेगा तब करेंगे।” यह वाक्य सुनने में सहज लगता है, पर वास्तव में यही वाक्य हमारे अनेक संकल्पों, योजनाओं और दायित्वों को अधूरा छोड़ देने का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। विशेषकर जब बात समाज और राष्ट्र के लिए किए जाने वाले संघ कार्य की हो, तब समय की प्रतीक्षा नहीं, बल्कि समय का नियोजन ही सबसे बड़ा साधन और सबसे बड़ा साध्य है। संघ कार्य कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे फुरसत में किया जाए; यह तो वही कार्य है जिसके लिए फुरसत पैदा की जाती है।


समय किसी के लिए रुकता नहीं। वह न किसी पद को देखता है, न किसी उम्र को, न किसी व्यस्तता को। समय सबको बराबर मिलता है—दिन के चौबीस घंटे। अंतर केवल इतना है कि कोई उन चौबीस घंटों को साध लेता है और कोई उन्हें यूँ ही बह जाने देता है। संघ कार्य करने वाला स्वयंसेवक यह भली-भांति समझता है कि राष्ट्र और समाज के कार्य के लिए अलग से समय कभी “मिलेगा” नहीं; उसे निकालना पड़ता है, और वह भी अनुशासन, संकल्प और प्राथमिकताओं के साथ।

आज का जीवन तेज़ है। नौकरी, व्यापार, परिवार, सामाजिक दायित्व—सब अपने-अपने हिस्से का समय माँगते हैं। ऐसे में संघ कार्य को अक्सर “अतिरिक्त” मान लिया जाता है। यही सबसे बड़ी भूल है। संघ कार्य अतिरिक्त नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला मूल कार्य है। जो व्यक्ति अपने जीवन में इस बात को समझ लेता है, वह समय के अभाव की शिकायत नहीं करता, बल्कि समय के सदुपयोग की योजना बनाता है।

समय नियोजन का अर्थ केवल घड़ी देखकर काम करना नहीं है। इसका अर्थ है अपने जीवन की प्राथमिकताओं को स्पष्ट करना। क्या महत्वपूर्ण है और क्या केवल तात्कालिक है—इसका विवेक विकसित करना ही समय नियोजन का मूल है। संघ कार्य करने वाला स्वयंसेवक जानता है कि व्यक्तिगत सुविधा से अधिक सामूहिक दायित्व महत्त्वपूर्ण है। इसलिए वह अपने आराम, मनोरंजन और कभी-कभी अपनी नींद तक को भी सुव्यवस्थित करता है, ताकि समाज के लिए कुछ समय नियमित रूप से दे सके।

संघ कार्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी निरंतरता है। यह कोई एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि जीवन भर का संस्कार है। निरंतरता तभी आती है जब समय नियोजन जीवन का स्वभाव बन जाए। जो कार्य जब-तब, अवसर मिलने पर किया जाए, वह प्रभावी नहीं हो सकता। प्रभाव वहीं पैदा होता है जहाँ नियमितता हो, अनुशासन हो और समय का सम्मान हो।

समय नियोजन स्वयंसेवक को आत्मअनुशासन सिखाता है। यह अनुशासन केवल कार्य तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे जीवन में झलकता है। समय पर उठना, समय पर पहुँचना, समय पर दायित्व निभाना—ये सब छोटे लगने वाले गुण वास्तव में बड़े परिवर्तन के आधार हैं। राष्ट्र निर्माण बड़े-बड़े नारों से नहीं, बल्कि समय पर किए गए छोटे-छोटे कर्तव्यों से होता है।

अक्सर लोग यह तर्क देते हैं कि आज की पीढ़ी के पास समय ही नहीं है। यह आंशिक सत्य हो सकता है, पर पूर्ण सत्य नहीं। समय है, पर वह बिखरा हुआ है। अनियोजित दिनचर्या, अनावश्यक व्यस्तताएँ और दिशाहीन मनोरंजन समय को चुपचाप निगल जाते हैं। जब स्वयंसेवक अपने दिन का लेखा-जोखा करता है, तब उसे स्वयं पता चलता है कि समय की कमी नहीं, बल्कि समय के उपयोग में कमी है।

संघ कार्य हमें सिखाता है कि समय का सदुपयोग ही सच्ची सेवा है। एक घंटे का नियोजित कार्य कई घंटों की अव्यवस्थित भागदौड़ से अधिक फलदायी होता है। जब हर कार्यकर्ता अपने हिस्से का समय ईमानदारी से देता है, तब संगठन स्वतः सशक्त बनता है। किसी एक पर बोझ नहीं पड़ता और न ही कार्य अधूरा रहता है।

यह भी समझना आवश्यक है कि समय नियोजन केवल व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक विश्वास के लिए भी आवश्यक है। जब कोई स्वयंसेवक समय पर आता है, समय पर दायित्व निभाता है, तो उससे जुड़े अन्य लोग भी प्रेरित होते हैं। समय की पाबंदी विश्वास पैदा करती है और विश्वास से संगठन मजबूत होता है।

संघ कार्य का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण है। और व्यक्ति निर्माण की पहली सीढ़ी है—अपने समय का निर्माण। जो स्वयं अपने समय का स्वामी नहीं, वह समाज को दिशा कैसे देगा? इसलिए संघ कार्य में समय नियोजन कोई तकनीकी विषय नहीं, बल्कि संस्कार का विषय है।

अंततः यह स्पष्ट है कि समय कभी अपने आप नहीं मिलेगा। जो समय का इंतज़ार करता है, वह अक्सर अवसर चूक जाता है। और जो समय का नियोजन करता है, वही इतिहास के निर्माण में सहभागी बनता है। संघ कार्य के संदर्भ में यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि यहाँ हर क्षण, हर प्रयास और हर स्वयंसेवक राष्ट्र की दीर्घकालीन यात्रा का हिस्सा होता है।

इसलिए आवश्यकता है इस सोच को बदलने की—“समय मिलेगा तब करेंगे” से “समय नियोजित कर करेंगे” तक की यात्रा की। यही यात्रा स्वयंसेवक को साधारण व्यक्ति से विशिष्ट बनाती है और समाज को सशक्त दिशा देती है। समय का निर्माण ही संघ कार्य की सच्ची साधना है, और इसी साधना से राष्ट्र का भविष्य गढ़ा जाता

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