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नारी शक्ति का वादा: संख्या बढ़ेगी, आवाज़ कब गूँजेगी?The promise of women's empowerment: the numbers will increase, but when will their voices be heard?

  

 कुर्सियाँ महिलाओं के नाम, फैसले पुरुषों की छाया में

प्रॉक्सी सरपंच से प्रॉक्सी सांसद: महिलाओं का सशक्तिकरण सिर्फ कागजी?

·      कृति आरके जैन

भारत की संसद ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पास किया – एक ऐसा कानून जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का ऐतिहासिक वादा करता है। यह कदम लिंग समानता की दिशा में बड़ा लगता है, लेकिन 2026 में भी यह वादा अधर में लटका है। जनगणना और परिसीमन के इंतजार में कार्यान्वयन 2029 या उससे आगे तक टल चुका है। इस बीच, घरों में बेटियों और महिलाओं की आवाज़ शून्य के करीब है। संसद की कुर्सियाँ महिलाओं के लिए खाली रखी जा रही हैं, लेकिन घर की मेज पर उनके फैसले की जगह पुरुषों की छाया छाई है। यह विरोधाभास भारत की सबसे कड़वी सच्चाई है – बाहर क्रांति का नारा, अंदर चुप्पी का बोझ।

यह आरक्षण सिर्फ संख्या नहीं, शक्ति का प्रतीक होना चाहिए। पंचायती राज में 33 प्रतिशत आरक्षण ने लाखों महिलाओं को सरपंच बनाया, गांवों में सड़कें, स्कूल और पानी के मुद्दे उठाए गए। लेकिन संसद स्तर पर देरी से सवाल उठता है – क्या संख्या बढ़ने से आवाज़ भी मजबूत होगी? जब तक घर में महिलाएँ पूर्ण निर्णय नहीं ले पातीं, संसद में उनकी उपस्थिति प्रतीकात्मक ही रहेगी। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के अनुसार, करीब 88.7 प्रतिशत विवाहित महिलाएँ तीन मुख्य घरेलू फैसलों (स्वास्थ्य, बड़ी खरीदारी, रिश्तेदारों से मिलना) में भाग लेती हैं। हालांकि, कई मामलों में यह भागीदारी पूर्ण स्वतंत्रता नहीं होती, और निर्णयों में पुरुषों का प्रभाव बना रहता है। यह आंकड़ा बताता है कि राजनीतिक आरक्षण से पहले घरेलू समानता की लड़ाई जीतनी होगी।  

घर में महिलाओं की आवाज़ दबाने वाले कारण गहरे और सदियों पुराने हैं। पितृसत्तात्मक संस्कृति बेटियों को बचपन से सिखाती है कि उनकी राय से ज्यादा महत्वपूर्ण परिवार की ‘इज्जत’ है। संपत्ति का अधिकार कम, आर्थिक निर्भरता ज्यादा – एनएफएचएस -5 डेटा दिखाता है कि सिर्फ 13 प्रतिशत महिलाएँ घर अकेले अपनी नाम पर रखती हैं, जबकि कुल (अकेले या संयुक्त रूप से) महिलाओं में घर/जमीन का स्वामित्व लगभग 42-43% है। पुरुषों में अकेले स्वामित्व का आंकड़ा काफी ज्यादा (लगभग 62%) है। दहेज, घरेलू हिंसा और सामाजिक दबाव उनकी स्वतंत्रता को कुचल देते हैं। शिक्षा और रोजगार में असमानता इस खाई को और गहरा करती है। जब बेटियाँ घर में चुप रहती हैं, तो समाज में भी दबाव महसूस करती हैं। संसद का 33 प्रतिशत इन दीवारों को तोड़ने का मौका है, लेकिन पहले घर की नींव मजबूत करनी होगी।

इस विरोधाभास के परिणाम पूरे समाज पर भारी पड़ते हैं। जब महिलाएँ घरेलू फैसलों से बाहर रहती हैं, तो परिवार असंतुलित होता है। बच्चे लिंग भेदभाव सीखते हैं, जो अगली पीढ़ी को प्रभावित करता है। आर्थिक रूप से भी नुकसान – विश्व बैंक और अन्य अध्ययनों के अनुसार, लिंग समानता में सुधार से भारत की जीडीपी में 20-30 प्रतिशत तक का संभावित लाभ हो सकता है (पूर्ण समानता पर)। स्वास्थ्य और शिक्षा में सुधार तब तक सीमित रहता है, जब तक माँएँ निर्णय नहीं ले पातीं। संसद में महिलाओं की बढ़ती संख्या इन मुद्दों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएगी – मातृत्व अवकाश, बाल देखभाल, वेतन समानता। लेकिन अगर घर में वे दबाव में हैं, तो राजनीतिक भूमिका भी सीमित रहेगी। यह चक्र तोड़ना जरूरी है – घर से शुरू होकर संसद तक।

उदाहरण बहुत स्पष्ट हैं। पंचायतों में महिला सरपंच अक्सर ‘प्रॉक्सी’ बन जाती हैं – पति या परिवार के पुरुष ही फैसले लेते हैं। संसद में भी यही खतरा मंडरा रहा है। इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल जैसी महिलाएँ शीर्ष पदों पर पहुँचीं, लेकिन आम घरों में स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। आज सोशल मीडिया जैसे माध्यम आवाज़ उठा रहे हैं, लेकिन ग्रामीण भारत में लाखों महिलाएँ अभी भी चुप हैं। 2026 में भी आरक्षण लागू न होने से निराशा बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट में भी इस देरी पर सवाल उठ चुके हैं – कब होगा यह कानून प्रभावी? असली बदलाव तब होगा, जब घर में बेटी की राय को महत्व मिले, न कि सिर्फ संसद में सीटें।

समाधान बहुआयामी होने चाहिए। शिक्षा से शुरुआत करें – लड़कियों को अपने अधिकारों की समझ दें। कानूनों का सख्त क्रियान्वयन हो – संपत्ति अधिकार और घरेलू हिंसा अधिनियम प्रभावी बनें। पुरुषों को साथ लें – जेंडर सेंसिटाइजेशन कार्यक्रम घर-घर तक पहुँचें। मीडिया सकारात्मक छवियाँ दिखाए। सरकार की योजनाएँ जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ को मजबूत क्रियान्वयन दें। घरेलू स्तर पर ट्रेनिंग हो – निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाने वाली। एनजीओ और कम्युनिटी ग्रुप्स अहम भूमिका निभा सकते हैं। संसद का आरक्षण एक साधन है, लेकिन घर में 100 प्रतिशत आवाज़ ही असली लक्ष्य होना चाहिए।

 ‘घर से संसद तक’ का नारा अब हकीकत बने। जब महिलाएँ घर में मजबूत होंगी, तो संसद में उनकी आवाज़ गूँजेगी। युवा पीढ़ी को जोड़ें – सोशल मीडिया पर जागरूकता फैलाएँ। पुरुष सहयोगी बनें। चुनौतियाँ बड़ी हैं – ग्रामीण-शहरी खाई, जाति-आधारित भेदभाव, आर्थिक असमानता। फिर भी परिवर्तन संभव है। पीढ़ीगत बदलाव लाएँ – माताएँ बेटियों को सिखाएँ कि आवाज़ उठाना उनका अधिकार है। सरकार को जनगणना और परिसीमन तेज करना होगा। अंत में, यह समाज की जिम्मेदारी है कि बेटियाँ हर जगह सुनी जाएँ।

33 प्रतिशत संसद का वादा निस्संदेह महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक है, लेकिन घर में शून्य प्रतिशत आवाज़ का बोझ आज भी सबसे बड़ा और गहरा खतरा बना हुआ है। यह कड़वा विरोधाभास हमें बार-बार याद दिलाता है कि असली लिंग समानता घर की चौखट से ही शुरू होती है, न कि सिर्फ संसद भवन की सीढ़ियों से। राजनीतिक आरक्षण एक मजबूत और आवश्यक कदम है, लेकिन घरेलू क्रांति के बिना यह प्रयास हमेशा अधूरा और प्रतीकात्मक ही रहेगा। बेटियाँ राष्ट्र की असली शक्ति हैं, उनकी आवाज़ को हर घर, हर गाँव, हर शहर के हर कोने में गूँजना चाहिए। सच्ची क्रांति तब होगी, जब संसद की कुर्सियाँ घर की मेज पर बैठी बेटियों और महिलाओं की आवाज़ से जुड़ जाएँगी। अब समय आ गया है – इस बदलाव को शुरू करने का, इसे पूरा करने का।

 

 

 

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