मध्यप्रदेश की राजनीति को बदलने वाली 'लाड़ली बहना योजना' ढाई साल का सफर तय कर एक दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हुई है. इसे सियासत का 'फुल सर्कल' ही कहेंगे कि जून 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब इस सफर की शुरुआत की थी, तब 1.25 करोड़ महिलाओं के खातों में पहली किस्त भेजी गई थी. आज, शुक्रवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव जब नर्मदापुरम से राज्य स्तरीय सम्मेलन में राशि ट्रांसफर करेंगे, तब भी लाभार्थियों का आंकड़ा वही 1.25 करोड़ है. फर्क सिर्फ इतना है कि तब बजट 1200 करोड़ था और अब यह बढ़कर 1836 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है.
शिवराज का वो 'सुबह 4 बजे' वाला आईडिया
इस योजना के पीछे की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने NDTV से एक खास बातचीत में खुलासा किया था कि यह विचार उन्हें बेचैनी के बीच आया था. उन्होंने बताया था, “एक दिन मैं पूरी रात जागता रहा. सुबह चार बजे पत्नी को उठाकर कहा- एक विचार आया है. बहनें मुझे अपना भाई मानती हैं, तो भाई को भी अपनी बहनों के लिए कुछ करना चाहिए. साल में एक बार पैसा देने से काम नहीं चलेगा, हर महीने देने से ही बहनों की जिंदगी में सम्मान आएगा.” जब अधिकारियों ने बजट पर सवाल उठाए, तो शिवराज का साफ जवाब था- "यह अभियान है, पैसा आ जाएगा."
मोहन यादव का 'मैराथन' और कर्ज का पहाड़
सत्ता संभालने के बाद डॉ. मोहन यादव ने न केवल इस योजना को जारी रखा, बल्कि इसकी रफ्तार भी बढ़ाई. जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 के बीच ही सरकार ने 38,635 करोड़ रुपये से अधिक की राशि ट्रांसफर कर दी है. अब तक कुल 48,632 करोड़ रुपये बहनों के खातों में पहुंच चुके हैं. लेकिन यह 'सम्मान' एक भारी कीमत के साथ आ रहा है. मध्यप्रदेश सरकार पिछले दो वर्षों में हर दिन औसतन 125 करोड़ रुपये का कर्ज ले रही है. राज्य पर कुल कर्ज अब 4,64,340 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है, जो राज्य के कुल वार्षिक बजट से भी 43,000 करोड़ रुपये ज्यादा है.
22 साल: 20 हजार करोड़ से 4.6 लाख करोड़ तक का बोझ
तुलना के लिए आंकड़े गवाही देते हैं कि करीब 22 साल पहले कांग्रेस शासन में राज्य पर कुल कर्ज मात्र 20,000 करोड़ रुपये था. आज अकेले ब्याज चुकाने में ही सरकार को सालाना 27,000 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं. 2026-27 के वित्तीय वर्ष में इस योजना का खर्च 22,680 करोड़ रुपये पहुंचने का अनुमान है. लाखों बहनों के लिए यह पैसा रसोई, दवा और बच्चों की पढ़ाई का संबल तो है, लेकिन सवाल वही खड़ा है- "पैसा कहां से आएगा?" क्या कर्ज लेकर किया गया यह वादा स्थायी है, या भविष्य में राज्य को इसकी कोई बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी होगी?

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