अजय कुमार बियानी
इंजीनियर एवं लेखक
पिछले नौ दशकों से भारत को विचार, संस्कार और सेवा के एक सूत्र में पिरोने का कार्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने निरंतर किया है। संघ कोई सामान्य संगठन नहीं बल्कि राष्ट्रकेंद्रित जीवन पद्धति है, जहाँ व्यक्ति अपने स्वार्थ, सुविधा और महत्वाकांक्षा से ऊपर उठकर राष्ट्र को सर्वोपरि मानता है। इसी जीवन दृष्टि का सजीव स्वरूप है संघ का प्रचारक, जिसका जीवन त्याग, तपस्या और मौन राष्ट्रसेवा का सतत संकल्प होता है। आज के समय में जब सामान्य व्यक्ति अपने स्थानांतरण के लिए वर्षों तक संघर्ष करता है, सिफारिशें ढूँढता है और असंतोष पालता है, तब संघ का प्रचारक जहाँ भी भेजा जाए, उसे राष्ट्रकार्य का आदेश मानकर सहर्ष स्वीकार करता है। उसके लिए स्थान नहीं बदलता, केवल दायित्व बदलता है
। प्रचारक का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण होता है, न घर का मोह, न संपत्ति का आकर्षण, न भविष्य की चिंता। एक छोटा सा थैला, कुछ वस्त्र और आवश्यक सामग्री ही उसकी निजी पूँजी होती है, शेष उसका जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित रहता है। जिस क्षेत्र में वह वर्षों कार्य करता है, वहाँ के कार्यकर्ता, समाज का स्नेह, आत्मीयता और स्मृतियाँ ही उसकी वास्तविक कमाई होती हैं, जिन्हें वह हृदय में संजोकर अगले दायित्व की ओर बढ़ जाता है। प्रचारक के लिए त्रिपुरा हो या कश्मीर, मरुस्थल हो या पर्वतीय क्षेत्र, भाषा और संस्कृति का अंतर गौण हो जाता है, क्योंकि हर भूभाग उसके लिए भारतमाता की सेवा का क्षेत्र होता है।
कई बार वह ऐसे स्थानों पर पहुँचता है जहाँ न कोई परिचय होता है, न सुविधा, न संसाधन, फिर भी वह बिना शिकायत, बिना अपेक्षा और बिना थकान मुस्कान के साथ अपने कार्य में जुट जाता है। यही प्रचारक जीवन की वास्तविक साधना है स्वयं को भूलकर समाज और राष्ट्र के लिए जीना। संघ का प्रचारक पूर्णकालिक रूप से राष्ट्रनिर्माण के कार्य में समर्पित रहता है। उसका जीवन पद, प्रतिष्ठा, प्रशंसा या व्यक्तिगत उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि सामाजिक जागरण, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता के लिए होता है। वह मंचों पर नाम नहीं खोजता, न प्रचार की लालसा रखता है, उसका कार्य मौन होता है पर प्रभाव गहरा और दीर्घकालिक होता है। आपदा हो या संकट, समाज सेवा का अवसर हो या संगठन विस्तार का कार्य, संघ का स्वयंसेवक सबसे पहले पहुँचता है
और श्रेय लेने में सबसे पीछे रहता है। यही संघ का मूल दर्शन है कि राष्ट्र का वैभव केवल सत्ता या सरकार से नहीं बल्कि चरित्रवान, संस्कारित और कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों से बनता है। प्रतिदिन लगने वाली शाखाएँ केवल शारीरिक अभ्यास का केंद्र नहीं बल्कि वह संस्कारशाला हैं जहाँ साधारण व्यक्ति अनुशासन, सेवा और राष्ट्रभाव से तपकर स्वयंसेवक बनता है। सामाजिक समरसता संघ का मूल उद्देश्य है, जहाँ जाति, वर्ग और भेदभाव से ऊपर उठकर पूरे समाज को एक परिवार के रूप में देखने का भाव विकसित किया जाता है। एक कुआँ, एक मंदिर, एक श्मशान का विचार केवल नारा नहीं बल्कि सामाजिक एकता का व्यवहारिक प्रयास है।
भारतीय संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों की रक्षा तथा उन्हें अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुँचाना संघ का सतत दायित्व रहा है। प्रचारक जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची सेवा वही है जिसमें अपेक्षा शून्य हो और सच्चा सुख वही है जो कर्तव्य पालन से प्राप्त हो। संघ के प्रचारक अपने आचरण से समाज को दिशा देते हैं और यह संदेश देते हैं कि व्यक्ति क्षणिक है, राष्ट्र शाश्वत है। ऐसे त्यागमय, तपस्वी और निस्वार्थ प्रचारकों को नमन, वंदन और अभिनंदन, जिनके कारण सेवा, संस्कार और संगठन की भावना समाज में जीवित और सशक्त बनी हुई है। तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहे न रहे। जय श्री राम, भारत माता की जय।
— इंजीनियर अजय कुमार बियानी


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