Top News

भोपाल: रैन बसेरों के हाल बेहाल, फिर भी ठंड में गरीबों का आखिरी सहारा Bhopal: The condition of night shelters is deplorable, yet they remain the last resort for the poor during the cold weather.

 

कटे-फटे गद्दों और अधूरी व्यवस्थाओं में गुजर रही बेघरों की रात राजधानी भोपाल में नगर निगम द्वारा बनाए गए रैन-बसेरे कागजों में गरीबों, मजदूरों और निराश्रितों के लिए राहत का ठिकाना हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। देखरेख के अभाव, संसाधनों की कमी और जिम्मेदारों की उदासीनता ने इन रैन-बसेरों को बदहाली का प्रतीक बना दिया है। इसके बावजूद, खुले आसमान और सड़कों की ठिठुरन से बचने के लिए यहीं रैन बसेरे गरीबों का आखिरी सहारा बने हुए हैं।



नगर निगम ने शहर के अलग-अलग इलाकों में लगभग 15 रैन बसेरे संचालित कर रखे हैं, जिनकी कुल क्षमता मात्र 1500 से 2000 लोगों की है, जबकि हकीकत यह है कि राजधानी में हर रात करीब 10 हजार से अधिक गरीब और बेसहारा लोग फुटपाथों, बस स्टैंडों और सार्वजनिक स्थानों पर सोने को मजबूर होते हैं। वर्तमान व्यवस्था जरूरत के एक छोटे से हिस्से को भी पूरा नहीं कर पा रही।

हालांकि, जमीनी हालात इन दावों से मेल नहीं खाते। रैन बसेरों में कमजोर सफाई, सीमित संसाधन और अनदेखी साफ संकेत देती है कि गरीबों के लिए बनी यह व्यवस्था सिर्फ किसी तरह बनी हुई है, बेहतर नहीं। 

अधिकारियों के ये हैं दावे महापौर मालती राय का कहना है कि निगम ने सभी रैन बसेरों में सोने और खाने की बेहतर व्यवस्था की है। ठंड से बचाव के लिए रूम हीटर लगाए गए हैं और दानदाताओं से भी सहयोग लिया जा रहा है। जल्द ही निरीक्षण कर कमियां दूर की जाएंगी। वहीं, नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन का दावा है कि 5 रुपए में अच्छा भोजन, कंबल, गद्दे और रजाइयों की व्यवस्था की गई है और अधिकारियों को रात में मॉनिटरिंग के निर्देश दिए गए हैं।

 कागजों में व्यवस्था, हकीकत में अव्यवस्था नगर निगम का दावा है कि रैन बसेरों में 5 रुपए में रहने, भोजन, शौचालय, कंबल और हीटर की सुविधा दी जा रही है। लेकिन जब स्वदेश की टीम ने शहर के विभिन्न रैन बसेरों का जायजा लिया, तो दावों और हकीकत के बीच गहरी खाई नजर आई। शाहजहानी पार्क को छोड़ दिया जाए, तो नादरा, आईएसबीटी, हटालपुर बस स्टैंड, नेहरू नगर, हमीदिया-सुल्तानिया अस्पताल परिसर, यू-मार्केट और भोपाल रेलवे स्टेशन प्लेटफॉर्म नंबर-6 के बाहर बने रैन बसेरों में व्यवस्थाएं बेहद दयनीय हैं। 

कहीं कंबलों की भारी कमी है, तो कहीं सालों पुराने, कटे-फटे गद्दे पड़े हैं। कई जगह भोजन की व्यवस्था न होने से गरीबों को भूखे पेट सोना पड़ता है। जमीनी हकीकत बनाम दावे जब तक नगर निगम सिर्फ दावों से आगे बढ़कर नियमित निरीक्षण, पर्याप्त संसाधन और जवाबदेही तय नहीं करता, तब तक रैन बसेरे राहत नहीं, मजबूरी का नाम ही बने रहेंगे।एमपी नगर जोन-2 स्थित रैन बसेरा तो अपनी दुर्दशा खुद बयान कर रहा है। 

करीब 50 बिस्तरों की क्षमता वाले इस रैन बसेरे में नल कनेक्शन तो है, लेकिन एक ही टंकी से सभी जरूरतें पूरी करनी पड़ती हैं। बारिश में रैन बसेरे के अंदर पानी भर जाता है। दो साल से कूलर खराब पड़ा है, पंखे धीमे चलते हैं। सफाई कर्मचारी नियमित नहीं आते, मजबूरी में स्टाफ को ही झाड़ू-पोछा करना पड़ता है। रैन बसेरे के चारों ओर अतिक्रमण है। अवैध दुकानें बन जाने से यह रैन बसेरा बाहर से दिखाई तक नहीं देता। शिकायतों और आवेदनों के बावजूद जोन अधिकारी और अन्य जिम्मेदार अब तक कोई सुधार नहीं कर पाए हैं, जिससे बेघर ठंड से परेशान हैं। 

आईएसबीटी रैन बसेरे की हालत भी दयनीय आईएसबीटी स्थित रैन बसेरे में 20 पुरुषों और 10 महिलाओं की क्षमता है, लेकिन केवल 10 कंबल उपलब्ध हैं। गद्दे गंदे और फटे हुए हैं। महिलाओं के कमरे के रोशनदान का कांच टूटा हुआ है, जिससे ठंडी हवा सीधे अंदर आती है। यहां एक ही हीटर है, जिसे पुरुष और महिला कक्षों में बारी-बारी से जलाया जाता है। अधिकांश यहां छिंदवाड़ा, बैतूल और मुलताई से आए छात्र रहते हैं, जो प्रतियोगी परीक्षाएं देने भोपाल आते हैं, लेकिन महंगे होटलों का खर्च नहीं उठा सकते। रैन बसेरे प्रबंधन कई बार नगर निगम से कंबल और गद्दे बदलने की मांग कर चुका है, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। शाहजहानी पार्क रैन बसेरा - दानदाताओं के भरोसे शाहजहानी पार्क रैन बसेरा साल भर खुला रहता है। यहां रहने वाले गरीबों को हर संभव सुविधा देने का प्रयास किया जा रहा है।

 खासकर ठंड में कंबल और गर्माहट की कमी नहीं होने दी जाती। यहां कुल क्षमता 250 बिस्तर की है, लेकिन ठंड के दिनों में यहां 300 से अधिक लोग ठहरते हैं। अतिरिक्त जगह पर जमीन पर गद्दे बिछाकर लोगों को सुलाया जाता है। यहां कंबल, गद्दे और रजाइयों की कोई कमी नहीं है, जिसका कारण नगर निगम से ज्यादा दानदाताओं का सहयोग है। रैन बसेरे में ठहरने वाले रायसेन निवासी कमलेश और हिम्मत सिंह बताते हैं कि दिनभर मजदूरी के बाद वे शाम को यहां आते हैं। 15 रुपए के टोकन पर दाल-चावल और सब्जी मिल जाती है। रूम हीटर के कारण ठंड का अहसास भी कम होता है। निगम और जनप्रतिनिधियों की लापरवाही रैन बसेरों की यह स्थिति सीधे तौर पर नगर निगम, संबंधित अधिकारियों और क्षेत्रीय पार्षदों की लापरवाही को उजागर करती है। योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, लेकिन निगरानी और क्रियान्वयन के स्तर पर सब कुछ ठप नजर आता है। शिकायत नहीं, क्योंकि विकल्प ही नहीं सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इन बदहाल हालात के बावजूद यहां ठहरने वाले गरीबों के चेहरे पर कोई शिकायत नहीं दिखती। वजह साफ है — इनके पास कोई और विकल्प नहीं। 15 रुपए में छत, चारदीवारी और थोड़ी सी गर्माहट भी इन्हें किसी राहत से कम नहीं लगती।

Post a Comment

Previous Post Next Post