लेखक : सी.ए. तेजेश सुतरिया
भारत आज विश्व के समक्ष एक उभरती हुई शक्ति के रूप में खड़ा है। आर्थिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक और वैचारिक हर स्तर पर राष्ट्र निरंतर प्रगति कर रहा है। हम गर्व के साथ स्वयं को सनातन संस्कृति का उत्तराधिकारी कहते हैं, किन्तु इसी गौरव के बीच एक प्रश्न बार-बार सामने आता है— *यदि हमारी सभ्यता सनातन है, तो हमारा नया वर्ष आज भी विदेशी परंपरा के अनुसार क्यों मनाया जाता है?
31st दिसंबर की रात्रि— शोर, आतिशबाज़ी, उलटी गिनती और क्षणिक उत्साह। तारीख बदल जाती है, पर जीवन की दिशा, उद्देश्य और संस्कार यथावत रहते हैं।
क्या केवल कैलेंडर का पन्ना पलटना ही नया वर्ष है?
*सनातन दृष्टि में नया वर्ष सनातन परंपरा में नया वर्ष केवल समय का परिवर्तन नहीं, बल्कि *जीवन के पुनर्संस्कार और नव आरंभ * का अवसर है । भारतीय परंपरा के अनुसार *चैत्र शुक्ल प्रतिपदा* से सनातन नववर्ष का आरंभ होता है। इसी दिन से ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी और यह नया साल 'विक्रमी संवत्' के रूप में मनाया जाता है।चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्रत्येक वर्ष मार्च के अंत या अप्रैल के प्रारंभ में आती है और इसी दिन से सनातन नववर्ष का आरंभ माना जाता है; यह तिथि चंद्र–सौर पंचांग पर आधारित होती है। यही वह दिन है जिसे सृष्टि-रचना का प्रारंभ माना गया है और यही से भारतीय पंचांग का नया चक्र आरंभ होता है। यह वही काल होता है जब—
• प्रकृति नवजीवन से भर उठती है
• वृक्षों में कोमल पत्तियाँ फूटती हैं
• खेतों में फसलें तैयार होती हैं
• वातावरण में नई ऊर्जा का संचार होता है
अर्थात् जब प्रकृति स्वयं नया जीवन आरंभ कर रही होती है, तभी भारत अपने नववर्ष का स्वागत करता है।
**सनातन नववर्ष का वास्तविक महत्व **: सनातन नववर्ष केवल उत्सव नहीं, बल्कि ***मानव, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन ***का प्रतीक है। यह पर्व हमें सिखाता है—
• आत्मशुद्धि और आत्ममंथन
• नए संकल्प और सकारात्मक दिशा
• सामाजिक समरसता और पारिवारिक एकता |
घर-घर ध्वज स्थापना, मंगल कलश, और शुभ कार्यों का प्रारंभ— ये सभी संकेत हैं कि यह पर्व *संस्कारों से जुड़ा हुआ उत्सव है,* दिखावे से नहीं।
*नई पीढ़ी और हमारी जिम्मेदारी* आज की नई पीढ़ी प्रश्न पूछती है— और यह उसका अधिकार है।
यदि हम उसे केवल यह कहें कि “ऐसा सदियों से होता आया है”, तो वह संतुष्ट नहीं होगी।पर यदि हम उसे यह समझाएँ कि सनातन नववर्ष जीवन को प्रकृति से जोड़ता है, संयम, संतुलन और संकल्प का मार्ग दिखाता है, तो वही पीढ़ी इसे गर्व के साथ अपनाएगी।
*उत्सव का विरोध नहीं*, पहचान का आग्रह यह लेख उत्सव मनाने के विरुद्ध नहीं है। उत्सव जीवन का आवश्यक अंग है। पर प्रश्न यह है कि— क्या हमारा नया वर्ष केवल उत्सव है, या एक नई शुरुआत भी है?
आइए, उत्सव मनाइए— पर उसे नए वर्ष का स्वरूप न दें।
क्यों न हम एक नया युग प्रारंभ करें, जहाँ भारत अपने सनातन नववर्ष को राष्ट्रव्यापी चेतना का रूप दे। जिस दिन पूरा भारत एक साथ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को नववर्ष के रूप में स्वीकार करेगा, उस दिन विश्व स्वयं समझेगा कि भारत का नया साल सिर्फ़ आनंद नहीं, बल्कि नवसृजन, नवचेतना और नवसंकल्प का पर्व है।
उत्सव मनाइए— पर अपने नववर्ष के रूप में नहीं।
आइए, हम स्वयं से आरंभ करें, अपनी अगली पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ें, और सनातन नववर्ष को भारत की पहचान बनाएं।
*क्योंकि “मजबूत जड़ें ही सशक्त भविष्य का निर्माण करती हैं।”*

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