प्रणव बजाज : व्यंग
मोदी बनाम राहुल, प्रियंका, केजरीवाल और विपक्षी दिग्गजों की राजनीतिक रस्साकशी; ज्ञानेश कुमार पर घमासान, अदालत में अगली सुनवाई का इंतजार
देश की राजनीति इन दिनों ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां हर नेता के पास अपना माइक है, अपना मंच है और अपनी-अपनी दलीलों का पहाड़ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार के फैसलों और उपलब्धियों के साथ मैदान में हैं, तो दूसरी तरफ राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा, मल्लिकार्जुन खड़गे, अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव और दूसरे विपक्षी नेता चुनावी व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर जारी विवाद ने इस राजनीतिक टकराव को और तेज कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर विपक्ष ने आपत्तियां उठाई हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी प्रदर्शन में उतरे, जबकि अलग-अलग दलों के नेताओं ने निर्वाचन आयोग की भूमिका पर सवाल किए। दूसरी ओर, भाजपा और निर्वाचन आयोग ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है।
मामला अब अदालत तक पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने ज्ञानेश कुमार को तत्काल निलंबित करने की मांग पर अंतरिम आदेश देने से इनकार किया, लेकिन संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। अगली सुनवाई 27 अक्टूबर को निर्धारित है। अदालत का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।
इधर राजनीतिक गलियारों में एक पुरानी कहावत फिर गूंज रही है—“हाथी चलता जाता है और कुत्ते भौंकते रहते हैं।” मोदी समर्थक इसे प्रधानमंत्री के विरोधियों पर तंज मानते हैं। लेकिन लोकतंत्र का एक दूसरा सच भी है: हाथी कितना ही विशाल क्यों न हो, जनता के सवालों से ऊपर नहीं होता और विरोध की आवाज कितनी ही तेज क्यों न हो, आरोप अपने आप सच नहीं बन जाते।
राहुल गांधी हों या प्रियंका, केजरीवाल हों या ममता बनर्जी—हर नेता को अपने आरोपों के प्रमाण देने होंगे। मोदी सरकार को भी अपने फैसलों और उपलब्धियों का जवाब तथ्यों से देना होगा। केवल नारे, कटाक्ष और भीड़ किसी विवाद का फैसला नहीं कर सकते।
आखिर लोकतंत्र में असली हाथी कौन है—सत्ता, विपक्ष या जनता? यही वह सवाल है, जिसका जवाब चुनाव, अदालत और जनता का विश्वास मिलकर देंगे।

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