मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नसबंदी के बाद बच्चे के जन्म से जुड़े करीब दो दशक पुराने मामले में महिला को मुआवजा देने से इनकार करते हुए ट्रायल कोर्ट का फैसला बरकरार रखा है। जस्टिस आशीष श्रोत्री की पीठ ने कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह साबित होता है कि महिला नसबंदी की सर्जरी से पहले ही गर्भवती हो चुकी थी। इसलिए इसे नसबंदी ऑपरेशन के फेल होने का मामला नहीं माना जा सकता।
मामला शिवपुरी जिला अस्पताल में हुई नसबंदी सर्जरी से जुड़ा था। महिला का दावा था कि उसके पहले से पांच बच्चे थे और परिवार नियोजन के लिए उसने नसबंदी कराई थी। बाद में उसे गर्भावस्था का पता चला और उसने अस्पताल तथा डॉक्टर पर चिकित्सकीय लापरवाही का आरोप लगाते हुए मुआवजे की मांग की।
अस्पताल की ओर से दलील दी गई कि 7 जुलाई 2004 की सोनोग्राफी में गर्भावस्था 18 से 20 सप्ताह की थी, जिससे संकेत मिलता है कि गर्भधारण सर्जरी से काफी पहले हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर डॉक्टर और अस्पताल की लापरवाही नहीं मानी थी।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल नसबंदी के बाद गर्भधारण हो जाने से डॉक्टर को मेडिकल लापरवाही का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके लिए यह साबित करने वाला ठोस साक्ष्य जरूरी है कि डॉक्टर ने अपेक्षित सावधानी और कौशल का पालन नहीं किया। अदालत ने State of Punjab v. Shiv Ram (2005) के सिद्धांत का भी उल्लेख किया।
अदालत ने अंततः महिला की अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट का आदेश कायम रखा। मामले का शीर्षक LK v. State of MP, FA-172-2010 है।

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