इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि असली शैक्षणिक योग्यता के आधार पर मिली नई नियुक्ति को केवल इस आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता कि अभ्यर्थी ने अपनी पिछली नियुक्ति रद्द होने की जानकारी नहीं दी थी, यदि उस पुरानी घटना का नई नियुक्ति की पात्रता या चयन पर कोई सीधा असर नहीं पड़ता।
मामला Anil Kumar v. State of U.P. and 3 others का है। याचिकाकर्ता को 2004 में शिक्षक नियुक्त किया गया था, लेकिन 2010 में उसका B.Ed. प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के बाद वह नियुक्ति रद्द कर दी गई। इसके बाद उसने नए सिरे से B.Ed. और TET की योग्यता हासिल की और 2015 में असिस्टेंट टीचर (गणित) के पद पर नियुक्त हुआ। उसकी सेवा बाद में नियमित भी हुई।
2018 में शिकायत हुई कि उसने फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल की है। जांच में हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और B.Sc. के प्रमाणपत्र वास्तविक पाए गए। इसके बावजूद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 20 अप्रैल 2019 को उसकी सेवा समाप्त कर दी।
कोर्ट ने कहा कि पिछली नियुक्ति का रद्द होना ‘बर्खास्तगी’ के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि याचिकाकर्ता को किसी अनुशासनात्मक आदेश के तहत सेवा से बर्खास्त या हटाया नहीं गया था। साथ ही, किसी जानकारी को छिपाने का आरोप तभी नियुक्ति रद्द करने का आधार बन सकता है, जब विज्ञापन, आवेदन पत्र, घोषणा-पत्र, सत्यापन फॉर्म या सेवा नियमों में उस जानकारी का खुलासा करना अनिवार्य किया गया हो।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जानबूझकर जानकारी छिपाने के आधार पर कार्रवाई करनी है तो संबंधित सेवा नियमों में निर्धारित विभागीय प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता। अदालत ने 20 अप्रैल 2019 का सेवा समाप्ति आदेश रद्द करते हुए याचिका स्वीकार कर ली।

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